श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 12: पूर्ण समाज : चार आध्यात्मिक वर्ग  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  7.12.6 
सुशीलो मितभुग्दक्ष: श्रद्दधानो जितेन्द्रिय: ।
यावदर्थं व्यवहरेत् स्त्रीषु स्त्रीनिर्जितेषु च ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्मचारी को सदाचार और शिष्टता से भरा होना चाहिए। उसे आवश्यकता से अधिक खाना या संग्रह नहीं करना चाहिए। उसे हमेशा सक्रिय और कुशल होना चाहिए और गुरु और शास्त्रों के निर्देशों में पूरा विश्वास रखना चाहिए। अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखते हुए उसे महिलाओं या उन पुरुषों से उतना ही संबंध रखना चाहिए जितना आवश्यक हो।
 
A brahmacari should be of good conduct and gentlemanly. He should neither eat nor hoard more than he needs. He should always be active and clever and should have full faith in the orders of the Guru and the scriptures. He should have full control over his senses and should associate with women or men under the influence of women only to the extent necessary.
तात्पर्य
एक ब्रह्मचारी को स्त्रियों अथवा स्त्री-लम्पट पुरुषों के साथ मेलजोल में अत्यन्त सावधानी बरतनी चाहिए। यधपि जब वह भिक्षा मांगने निकलता है, तो स्त्रियों और स्त्री-लम्पट पुरुषों से बात करना ज़रूरी होता है, परन्तु यह संगति अल्प समय के लिए ही होनी चाहिए और उनसे केवल भिक्षा मांगने के बारे में ही बात करनी चाहिए, उससे अधिक नहीं। एक ब्रह्मचारी को स्त्री-लम्पट व्यक्तियों से मेलजोल करने में अत्यंत सावधानी बरतनी चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)