Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 7.12.18: वानप्रस्थ आश्रम में रहने वाले को जुती हुई भूमि में उगा अन्न नहीं खाना चाहिए। उसे बिना जुती भूमि में उगे वे अनाज भी नहीं खाने चाहिए जो पूरी तरह पके न हों। न ही वानप्रस्थ को आग में पका अन्न खाना चाहिए। निस्संदेह, उसे सूर्य के प्रकाश में पके फल ही खाने चाहिए। | bhagavat अध्याय 7.12: पूर्ण समाज : चार आध्यात्मिक वर्ग । bhagavat स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
न कृष्टपच्यमश्नीयादकृष्टं चाप्यकालत: ।
अग्निपक्वमथामं वा अर्कपक्वमुताहरेत् ॥ १८ ॥
अनुवाद
वानप्रस्थ आश्रम में रहने वाले को जुती हुई भूमि में उगा अन्न नहीं खाना चाहिए। उसे बिना जुती भूमि में उगे वे अनाज भी नहीं खाने चाहिए जो पूरी तरह पके न हों। न ही वानप्रस्थ को आग में पका अन्न खाना चाहिए। निस्संदेह, उसे सूर्य के प्रकाश में पके फल ही खाने चाहिए।
A person living in the Vanaprastha ashram should not eat food grown in tilled land. He should also not eat food grown in uncultivated land that is not fully ripe. Neither should a Vanaprastha eat food cooked in fire. Of course, he should eat only fruits ripened in sunlight.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥