श्रवणं कीर्तनं चास्य
स्मरणं महात्म गे
सेव्यज्यवनीति दास्यं
सख्यं आत्मसमर्पणम्
सभी को भगवान् का भक्त बनना चाहिए, क्यूंकि भगवान् का भक्त बनने से बाकी के गुण अपने आप ही आ जाते हैं |
यस्यास्ति भक्ति भगवत्य अकिंचना
सर्वैर् गुणैस्तत्र समासते सुराः |
हरवाभक्तस्य कुतो महाद-गुना
मनोरथेनासति धावतो बहिः |
“जो भगवान् में अडिग भक्ति रखता हैं, उसके अंदर भगवान् और देवी-देवताओं के सभी अच्छे गुण हमेशा दिखाई देते हैं | इसके विपरीत, जो परमेश्वर में भक्ति नहीं रखते उनके अंदर कोई भी अच्छे गुण नहीं होते, क्यूंकि वो मानसिक रूप से भौतिकता में लगे रहते हैं, जो भगवान् का बाह्य रूप हैं |” (भागवत पुराण 5.18.12) इसलिए हमारा कृष्णा चेतना आन्दोलन सर्व-व्यापी हैं | मानवीय सभ्यता को इसे बहुत ही गंभीरता से लेना चाहिए और विश्व शांति के लिए इसके सिद्धांतों का अभ्यास करना चाहिए |
