श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 10: भक्त शिरोमणि प्रह्लाद  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  7.10.63 
तेऽसुरा ह्यपि पश्यन्तो न न्यषेधन्विमोहिता: ।
तद्विज्ञाय महायोगी रसपालानिदं जगौ ।
स्मयन्विशोक: शोकार्तान्स्मरन्दैवगतिं च ताम् ॥ ६३ ॥
 
 
अनुवाद
असुर बछड़े और गाय को देख सकते थे, लेकिन भगवान द्वारा उत्पन्न मोह शक्ति के कारण वे उन्हें मना नहीं कर सके। महायोगी मय दानव को पता चल गया कि बछड़ा और गाय अमृत पी रहे हैं और वह यह समझ गया कि यह अदृश्य दैवी शक्ति के कारण हो रहा है। अतः वह पश्चात्ताप करते हुए असुरों से बोला।
 
The demons saw the calf and the cow but could not stop them due to the power of attachment created by the Lord. The great Yogi Maya demon came to know that the calf and the cow were drinking the nectar and he understood that this was happening due to the invisible divine power. Thus he spoke to the demons in repentance.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)