श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 10: भक्त शिरोमणि प्रह्लाद  »  श्लोक 15-17
 
 
श्लोक  7.10.15-17 
श्रीप्रह्राद उवाच
वरं वरय एतत्ते वरदेशान्महेश्वर ।
यदनिन्दत्पिता मे त्वामविद्वांस्तेज ऐश्वरम् ॥ १५ ॥
विद्धामर्षाशय: साक्षात्सर्वलोकगुरुं प्रभुम् ।
भ्रातृहेति मृषाद‍ृष्टिस्त्वद्भ‍क्ते मयि चाघवान् ॥ १६ ॥
तस्मात्पिता मे पूयेत दुरन्ताद् दुस्तरादघात् ।
पूतस्तेऽपाङ्गसंद‍ृष्टस्तदा कृपणवत्सल ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
प्रह्लाद महाराज ने कहा - हे भगवान, आप पापियों पर इतने कृपालु हैं इसीलिए मैं आपसे एक ही वरदान माँगता हूँ। मुझे पता है कि आपने मेरे पिता को मृत्यु के समय अपनी दयालु दृष्टि डाल कर उन्हें पवित्र कर दिया था, लेकिन वह आपकी शक्ति और महिमा को ना जानते हुए भी आप पर क्रोधित थे क्यूंकी वह यह सोचते थे कि आपने ही उनके भाई की हत्या करवाई है। इस तरह उन्होंने सभी जीवों के गुरु आपकी सीधे-सीधे निंदा की और उन्होंने मेरे ऊपर, जो आपका भक्त था, अनेक पाप किये। मैं चाहता हूँ कि उन्हें इन पापों से मुक्ति मिल जाए।
 
Prahlada Maharaja said: O Supreme Lord, since you are so merciful to the fallen souls, I ask you for only one boon. I know that you purified my father at the time of his death by casting your glance of mercy on him, but, unaware of your power and superiority, he was angry with you, falsely thinking that you were going to kill his brother. In this way he directly slandered you, the teacher of all living entities, and committed heinous sins against me, your devotee. I wish that he be forgiven for these sins.
तात्पर्य
हालांकि हिरण्यकशिपु जैसे ही भगवान की गोद में आया वह पवित्र हो गया और प्रभु ने उसे देखा तब भी प्रह्लाद महाराज फिर भी भगवान के अपने मुख से सुनना चाहते थे कि उसके पिताजी भगवान की अकारण दया से पवित्र हो गए थे | प्रह्लाद महाराज ने अपने पिता के लिए यह प्रार्थना भगवान को अर्पित की | एक वैष्णव पुत्र के रूप में अपने पिता द्वारा उसपर थोपी गई सभी असुविधाओं के बावजूद वह अपने पिता के स्नेह को नहीं भूल सके |
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)