श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 1: समदर्शी भगवान्  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  7.1.48 
श्रीयुधिष्ठिर उवाच
विद्वेषो दयिते पुत्रे कथमासीन्महात्मनि ।
ब्रूहि मे भगवन्येन प्रह्लादस्याच्युतात्मता ॥ ४८ ॥
 
 
अनुवाद
महाराज युधिष्ठिर ने पूछा: हे नारद मुनि, नरसिंह अवतार के समय हिरण्यकशिपु और उनके प्यारे पुत्र प्रह्लाद महाराज में ऐसी शत्रुता क्यों थी? प्रह्लाद महाराज भगवान कृष्ण के ऐसे बड़े भक्त कैसे बन गए? कृपया यह मुझे बताएं।
 
Maharaja Yudhisthira asked: O sage Narada, why was there such enmity between Hiranyakshipu and his beloved son Prahlada Maharaja? How did Prahlada Maharaja become such a great devotee of Lord Krishna? Please tell me this.
तात्पर्य
भगवान कृष्ण के सभी भक्त अच्युतात्मा कहे जाते हैं क्योंकि वे प्रहलाद महाराज के चरणों का अनुसरण करते हैं। अच्युत अचूक भगवान विष्णु को संदर्भित करता है, जिसका हृदय हमेशा अचूक होता है। क्योंकि भक्त अचूक से जुड़े होते हैं, इसलिए उन्हें अच्युतात्मा कहा जाता है।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध सात के अंतर्गत पहला अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)