श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 1: समदर्शी भगवान्  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  7.1.34 
श्रीयुधिष्ठिर उवाच
कीद‍ृश: कस्य वा शापो हरिदासाभिमर्शन: ।
अश्रद्धेय इवाभाति हरेरेकान्तिनां भव: ॥ ३४ ॥
 
 
अनुवाद
महाराज युधिष्ठिर ने पूछा: किस प्रकर के महान् अभिशाप ने मुक्त विष्णु-भक्तों को भी प्रभावित किया और किस प्रकार का व्यक्ति भगवान के भी पार्षदों को श्राप दे सका? भगवान के दृढ़ भक्तों के लिए इस भौतिक जगत में फिर से आना असम्भव है। मैं इस पर विश्वास नहीं कर सकता।
 
Maharaja Yudhisthira asked: What kind of great curse affected even the liberated devotees of Viṣṇu, and what kind of person could curse even the associates of the Lord? It is impossible for the steadfast devotees of the Lord to fall back into this material world. I cannot believe it.
तात्पर्य
भगवद्-गीता (8.16) में प्रभु स्पष्ट रूप से कहते हैं, मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते: जो भौतिक संदूषण से मुक्त हो जाता है और घर लौट जाता है, भगवान के पास, वो इस भौतिक संसार में वापस नहीं आता। भगवद्-गीता (4.9) में कहीं और कृष्ण कहते हैं:

जन्म कर्म च मे दिव्यम्

एवं यो वेत्ति तत्त्वतः

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म

नैति मामेति सोऽर्जुन

"जो मेरे प्रकट होने और कार्यों की आध्यात्मिक प्रकृति को जानता है, वो शरीर छोड़ने पर इस भौतिक संसार में फिर से जन्म नहीं लेता, बल्कि मेरे शाश्वत निवास को प्राप्त करता है।" इसलिए महाराजा युधिष्ठिर हैरान थे कि एक शुद्ध भक्त इस भौतिक संसार में कैसे लौट सकता है। यह निश्चित रूप से एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)