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bhagavat 6.9.8: ब्रह्महत्या के पापफल के चतुर्थांश को अपने ऊपर लेने के कारण पेड़ों के रस में पापफल दिखाई देते हैं [और इसलिए इन्हें पीना वर्जित है]। इसके बदले में इंद्र से पेड़ों ने यह वरदान लिया था कि काटे जाने पर भी उनकी शाखाएँ फिर से उग आयेंगी।   |   bhagavat अध्याय 6.9: वृत्रासुर राक्षस का आविर्भाव   ।   bhagavat स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 9: वृत्रासुर राक्षस का आविर्भाव  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  6.9.8 
तुर्यं छेदविरोहेण वरेण जगृहुर्द्रुमा: ।
तेषां निर्यासरूपेण ब्रह्महत्या प्रद‍ृश्यते ॥ ८ ॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्महत्या के पापफल के चतुर्थांश को अपने ऊपर लेने के कारण पेड़ों के रस में पापफल दिखाई देते हैं [और इसलिए इन्हें पीना वर्जित है]। इसके बदले में इंद्र से पेड़ों ने यह वरदान लिया था कि काटे जाने पर भी उनकी शाखाएँ फिर से उग आयेंगी।
 
The trees, in return for the boon from Indra that their branches will grow again even if cut, took one fourth of the sins of killing a brahma. These sins appear in the form of juice oozing out of the trees (so drinking this juice is forbidden).
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)