श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 9: वृत्रासुर राक्षस का आविर्भाव  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  6.9.51 
मघवन् यात भद्रं वो दध्यञ्चमृषिसत्तमम् ।
विद्याव्रततप:सारं गात्रं याचत मा चिरम् ॥ ५१ ॥ H
 
 
अनुवाद
हे मघवा इन्द्र! तुम्हारा मंगल हो। मैं तुमसे महर्षि दधीचि के पास जाकर उनसे उनका शरीर मांगने का सुझाव देता हूँ। वे ज्ञान, व्रत और तपस्या में सिद्ध हो गये हैं और उनका शरीर बहुत मज़बूत है। बिना विलंब किये उनसे उनका शरीर मांगो।
 
O Maghva (Indra)! May you be blessed. I advise you to go to the great sage Dadhyancha (Dadhichi). He is highly accomplished in knowledge, vows and penance and his body is extremely strong. Now do not delay. Go to him and ask for his body.
तात्पर्य
इस भौतिक संसार में सभी, भगवान ब्रह्मा से लेकर चींटी तक, अपने शरीर को आरामदायक बनाए रखने के लिए उत्सुक हैं। एक शुद्ध भक्त भी आरामदायक हो सकता है, लेकिन वह ऐसे आशीर्वाद के लिए उत्सुक नहीं है। चूँकि स्वर्ग के राजा मघवन अभी भी एक आरामदायक शारीरिक स्थिति की आकांक्षा रखते थे, भगवान विष्णु ने उन्हें दध्यंच से उनके शरीर के लिए पूछने की सलाह दी, जो उनके ज्ञान, व्रत और तपस्या के कारण बहुत मजबूत था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)