आमी-विज्ञ, एई मूर्खे 'विषय' केने दिबा?
स्वा-चरणामृत दीया 'विषय' भूलाइबा
"चूंकि मैं बहुत बुद्धिमान हूं, इसलिए मैं इस मूर्ख को भौतिक समृद्धि क्यों दूं? इसके बजाय, मैं उसे अपने कमल चरणों के आश्रय का अमृत दूंगा और उसे भौतिक भोग को भूलने में मदद करूंगा।" यदि कोई भगवान से भक्ति सेवा के बदले भौतिक संपत्ति के लिए ईमानदारी से प्रार्थना करता है, तो भगवान, जो ऐसे मूर्ख भक्त की तरह मूर्ख नहीं हैं, उस पर विशेष कृपा दिखाते हैं, जो उसके पास मौजूद भौतिक संपत्ति को छीनकर धीरे-धीरे उसे बुद्धि देते हैं कि वह केवल अपने कमल चरणों की सेवा करके संतुष्ट हो। श्रील विस्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने इस संबंध में टिप्पणी की है कि अगर एक मूर्ख बच्चा अपनी माँ से उसे जहर देने का अनुरोध करता है, तो माँ, बुद्धिमान होने के नाते, उसे जहर नहीं देगी, भले ही वह उससे अनुरोध करता हो। एक भौतिकवादी यह नहीं जानता है कि भौतिक संपत्ति को स्वीकार करने का अर्थ जहर या जन्म और मृत्यु की पुनरावृत्ति को स्वीकार करना है। एक बुद्धिमान व्यक्ति, एक ब्राह्मण, भौतिक बंधन से मुक्ति चाहता है। यही एक इंसान का असली स्वार्थ है।
