श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 9: वृत्रासुर राक्षस का आविर्भाव  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  6.9.49 
न वेद कृपण: श्रेय आत्मनो गुणवस्तुद‍ृक् ।
तस्य तानिच्छतो यच्छेद्यदि सोऽपि तथाविध: ॥ ४९ ॥
 
 
अनुवाद
जो लोग भौतिक सम्पत्ति को ही सब कुछ मानते हैं या जीवन का अंतिम लक्ष्य समझते हैं, वे कंजूस [कृपण] कहलाते हैं। वे आत्मा की परम आवश्यकता को नहीं जानते। इतना ही नहीं, अगर कोई ऐसे मूर्खों की इच्छाओं को पूरा करता है, तो उसे भी मूर्ख ही समझा जाना चाहिए।
 
Those who consider material wealth as everything or the ultimate goal of life are called misers. They do not know the ultimate need (interest) of the soul. Not only this, if someone fulfills the desire of such fools, he should also be considered a fool.
तात्पर्य
दो प्रकार के मनुष्य होते हैं - कृपण और ब्राह्मण। ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म को जानता है, जो पूर्ण सत्य है, और इसलिए वह अपने वास्तविक हित को जानता है। हालाँकि, एक कृपण वह है जिसके पास जीवन की एक भौतिक, शारीरिक अवधारणा है। एक कृपण नहीं जानता कि अपने मानवीय या देवता जीवन का उपयोग कैसे किया जाए, इसलिए प्रकृति के भौतिक तरीकों द्वारा बनाई गई चीजों से आकर्षित होता है। कृपण, जो हमेशा भौतिक लाभों की इच्छा रखते हैं, मूर्ख होते हैं, जबकि ब्राह्मण, जो हमेशा आध्यात्मिक लाभ चाहते हैं, बुद्धिमान होते हैं। यदि एक कृपण, अपने स्वार्थ को न जानते हुए, मूर्खता से भौतिक चीज मांगता है, तो वह जो उसे पुरस्कृत करता है वह भी मूर्ख है। हालाँकि, कृष्ण एक मूर्ख व्यक्ति नहीं हैं; वह सर्वोच्च बुद्धिमान हैं। यदि कोई भौतिक लाभों के लिए कृष्ण के पास आता है, तो कृष्ण उसे भौतिक चीजें नहीं देते जो वह चाहता है। इसके बजाय, भगवान उसे बुद्धि देते हैं ताकि वह अपनी भौतिक इच्छाओं को भूल जाए और भगवान के कमल चरणों से जुड़ जाए। ऐसे मामलों में, यद्यपि कृष्ण भगवान से भौतिक चीजों के लिए प्रार्थना करता है, भगवान कृष्ण के पास जो भी भौतिक संपत्ति होती है उसे छीन लेते हैं और उसे भक्त बनने का भाव देते हैं। जैसा कि भगवान ने चैतन्य-चरितामृत (मध्यम 22.39) में कहा है:

आमी-विज्ञ, एई मूर्खे 'विषय' केने दिबा?

स्वा-चरणामृत दीया 'विषय' भूलाइबा

"चूंकि मैं बहुत बुद्धिमान हूं, इसलिए मैं इस मूर्ख को भौतिक समृद्धि क्यों दूं? इसके बजाय, मैं उसे अपने कमल चरणों के आश्रय का अमृत दूंगा और उसे भौतिक भोग को भूलने में मदद करूंगा।" यदि कोई भगवान से भक्ति सेवा के बदले भौतिक संपत्ति के लिए ईमानदारी से प्रार्थना करता है, तो भगवान, जो ऐसे मूर्ख भक्त की तरह मूर्ख नहीं हैं, उस पर विशेष कृपा दिखाते हैं, जो उसके पास मौजूद भौतिक संपत्ति को छीनकर धीरे-धीरे उसे बुद्धि देते हैं कि वह केवल अपने कमल चरणों की सेवा करके संतुष्ट हो। श्रील विस्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने इस संबंध में टिप्पणी की है कि अगर एक मूर्ख बच्चा अपनी माँ से उसे जहर देने का अनुरोध करता है, तो माँ, बुद्धिमान होने के नाते, उसे जहर नहीं देगी, भले ही वह उससे अनुरोध करता हो। एक भौतिकवादी यह नहीं जानता है कि भौतिक संपत्ति को स्वीकार करने का अर्थ जहर या जन्म और मृत्यु की पुनरावृत्ति को स्वीकार करना है। एक बुद्धिमान व्यक्ति, एक ब्राह्मण, भौतिक बंधन से मुक्ति चाहता है। यही एक इंसान का असली स्वार्थ है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)