श्रीभगवान् ने कहा - हे प्यारे देवो! तुम लोगों ने भली-भांति ज्ञानपूर्वक मेरी स्तुति की है, जिससे मैं तुम लोगों से अत्यन्त प्रसन्न हूँ। मनुष्य ऐसे ज्ञान के कारण मुक्ति पा जाता है और मेरे उच्च पद को स्मरण करता रहता है, जो भौतिक जीवन की स्थितियों के ऊपर है। ऐसा भक्त पूर्ण ज्ञान में रहकर स्तुति करने पर शुद्ध हो जाता है। मेरी भक्ति करने का यही स्त्रोत है।
Sri Bhagavan said—O dear Devas! You have praised Me with great knowledge, due to which I am very pleased with you. A man becomes liberated by such knowledge and keeps remembering My exalted position, which is above the conditions of material life. Such a devotee becomes pure by praising Me in full knowledge. This is the source of worshipping Me.
तात्पर्य
भागवद् व्यक्तित्व का आत्मोतमश्लोक नाम भी है, जिसका अभिप्राय यह है कि उनकी स्तुति चुनिंदा पदों से की जाती है। भक्ति का अर्थ श्रवणं कीर्तनं विष्णो: है, भगवान विष्णु के बारे में जप करना और सुनना। अवैयक्तिकवादी पवित्र नहीं हो सकते क्योंकि वे भगवद् व्यक्तित्व के लिए वैयक्तिक प्रार्थनाएँ नहीं करते। भले ही वे कभी-कभार प्रार्थनाएँ करते हों, पर प्रार्थनाएँ परमบุद्ध के लिए नहीं होतीं। अवैयक्तिकवादी कभी-कभार अपने अधूरे ज्ञान का परिचय प्रभु को नामहीन कह कर देते हैं। वे हमेशा अप्रत्यक्ष प्रार्थनाएँ करते हैं, कहते हुए, "आप यह हैं, आप वह हैं," पर वे नहीं जानते कि वे किसे प्रार्थना कर रहे हैं। पर एक भक्त हमेशा वैयक्तिक प्रार्थनाएं करता है। एक भक्त कहता है, गोविंदम आदि-पुरुषं तम अहं भजामी: “मैं गोविंद को, कृष्ण को, अपनी आदरपूर्ण प्रणाम अर्पित करता हूँ।” प्रार्थना करने का यही तरीका है। अगर कोई भगवद् व्यक्तित्व को ऐसी वैयक्तिक प्रार्थनाएँ करना जारी रखता है, तो वह शुद्ध भक्त बनने और घर लौटने, भगवद् के पास वापस जाने के योग्य हो जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥