अतः हे मधुसूदन! जिनके मन में आपकी महिमा के सागर से एक अमृत की बूँद भी उतर गई हैं उनके मन में सतत आनंद की धार बहती रहती है | ऐसे महात्मा जीव जो दृष्टि और श्रवण इंद्रियों से प्राप्त होने वाली तथाकथित भौतिक सुख की छाया को भूल जाते हैं | ऐसे भक्तगण सभी इच्छाओं से मुक्त हो जाते हैं और सभी जीवों के वास्तविक मित्र बन जाते हैं | वे अपने मन को आप में समर्पित कर परमानंद की प्राप्ति करते हुए और जीवन के असली लक्ष्य को प्राप्त करने में निपुण होते हैं | हे भगवान! आप ऐसे भक्तों के प्रिय मित्र और आत्मा हैं जिन्हें इस भौतिक संसार में कभी वापस नहीं लौटना पड़ता | फिर वे आपकी भक्ति को कैसे त्याग सकते हैं?
Therefore, O Madhusudana, those who have tasted even a single nectar-like drop of the ocean of Your glory have a continuous flow of bliss in their minds. Such great devotees forget the glimpses of the so-called material pleasures arising from the visual and auditory senses. Such devotees, free from all desires, are the real friends of all living entities. They are adept at achieving the real purpose of life by surrendering their minds to You and enjoying transcendental bliss. O Lord, You are the beloved friend and soul of such devotees who never have to return to this material world. How can they abandon Your devotion?
तात्पर्य
यद्यपि गैर-भक्त, अपने अल्प ज्ञान और काल्पनिक आदतों के कारण, भगवान की वास्तविक प्रकृति को नहीं समझ सकते हैं, एक भक्त जिसने एक बार भगवान के चरण कमलों से अमृत का स्वाद चखा है, वह महसूस कर सकता है कि भगवान की भक्ति सेवा में क्या पारलौकिक आनंद है। एक भक्त जानता है कि केवल भगवान की सेवा करके, वह सभी की सेवा करता है। इसलिए भक्त सभी जीवित प्राणियों के वास्तविक मित्र हैं। केवल एक शुद्ध भक्त ही सभी शर्तों वाले व्यक्तियों के लाभ के लिए भगवान की महिमा का प्रचार कर सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥