हमें ईश्वर में विरोधाभास पाकर आश्चर्य नहीं करना चाहिए। वास्तव में कोई विरोधाभास नहीं है। यही उनका सर्वोच्च होने का अर्थ है। क्योंकि वे सर्वशक्तिमान हैं, इसलिए वे सशर्त आत्मा के उनके अस्तित्व या गैर-अस्तित्व के तर्कों के अधीन नहीं हैं। वे अपने भक्तों की रक्षा करके उनके दुश्मनों को मार कर प्रसन्न होते हैं। उन्हें मारना और रक्षा करना दोनों ही पसंद है।
द्वंद्व से ऐसी मुक्ति न केवल भगवान पर लागू होती है बल्कि उनके भक्तों पर भी होती है। वृंदावन में, व्रजभूमि की गोपियाँ, भगवान कृष्ण, ईश्वर के साथ अपने साथ में दिव्य आनंद का आनंद लेती हैं, और जब कृष्ण और बलराम वृंदावन से मथुरा के लिए चले जाते हैं तो उन्हें अलगाव में भी वही दिव्य आनंद महसूस होता है। ईश्वर या उनके शुद्ध भक्तों के लिए भौतिक दुख या सुख का कोई सवाल ही नहीं है, हालाँकि कभी-कभी उनकी दुखी या खुश होने की बात सरसरी तौर पर कही जाती है। जो आत्मारामा है वह दोनों तरह से आनंदित रहता है।
अभक्त लोग सर्वोच्च प्रभु या उनके भक्तों में विद्यमान विरोधाभासों को समझ नहीं पाते। इसलिए भगवद गीता में प्रभु कहते हैं, भक्त्या मामभिजानाति: दिव्य लीलाओं को भक्ति सेवा के माध्यम से समझा जा सकता है; अभक्तों के लिए वे अकल्पनीय हैं। अचिंत्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेट: सर्वोच्च प्रभु और उनका रूप, नाम, लीलाएं और सामग्री अभक्तों के लिए अकल्पनीय हैं और किसी को भी ऐसी वास्तविकताओं को मात्र तार्किक तर्कों से समझने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। वे किसी को भी परम सत्य के बारे में सही निष्कर्ष पर नहीं पहुंचाएंगे।
