श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 9: वृत्रासुर राक्षस का आविर्भाव  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  6.9.36 
न हि विरोध उभयं भगवत्यपरिमितगुणगण ईश्वरेऽनवगाह्यमाहात्म्येऽर्वाचीनविकल्पवितर्कविचारप्रमाणाभासकुतर्कशास्त्रकलिलान्त:करणाश्रयदुरवग्रहवादिनां विवादानवसर उपरत समस्तमायामये केवल एवात्ममायामन्तर्धाय को न्वर्थो दुर्घट इव भवति स्वरूपद्वयाभावात् ॥ ३६ ॥
 
 
अनुवाद
हे भगवान! आप में सारे विरोधाभासों का समन्वय हो जाता है। हे ईश्वर! आप परम पुरुष, अनंत दिव्य गुणों के भंडार और परम नियंत्रक हैं। इसलिये आपकी असीमित महिमा बद्धजीवों की कल्पना से परे हैं। बहुत से आधुनिक धर्मशास्त्री सच्चाई जाने बिना ही सही और गलत के बारे में तर्क करते हैं। उनके तर्क हमेशा झूठे और उनके निर्णय अपूर्ण होते हैं क्योंकि उनके पास आपके बारे में ज्ञान प्राप्त करने के लिए कोई अधिकृत प्रमाण नहीं है। चूँकि उनके मन उन शास्त्रों से परेशान रहते हैं जिनमें गलत निष्कर्ष होते हैं, इसलिए वे आपके बारे में सच्चाई नहीं समझ पाते। इसके अलावा, सही निष्कर्ष पर पहुंचने की अशुद्ध इच्छा के कारण, उनके सिद्धांत आपको प्रकट करने में असमर्थ रहते हैं, क्योंकि आप उनकी भौतिक अवधारणाओं से परे हैं। आप एक हैं और आपके जैसा दूसरा कोई नहीं है, इसलिए आप में करना और न करना, सुख और दुख जैसे विरोधाभास विरोधाभासी नहीं हैं। आपकी सामर्थ्य इतनी महान है कि आप अपनी इच्छानुसार कुछ भी कर और मिटा सकते हैं। उस सामर्थ्य से आपके लिए क्या असंभव है? चूँकि आपकी स्वाभाविक स्थिति में कोई द्वैत नहीं है, इसलिए आप अपनी ऊर्जा के प्रभाव से सब कुछ कर सकते हैं।
 
O Lord! All opposites disappear in You. O Lord! Since You are the Supreme Person, the repository of infinite transcendental qualities, the Supreme Controller, Your infinite glory is beyond the imagination of conditioned souls. Many theoreticians argue about truth and falsehood without knowing what is really true. Their arguments are false and decisions indecisive because they have no valid proof of knowing You. Since their minds are disturbed by false conclusions from religious texts, they cannot understand what is true. Moreover, while arriving at the correct conclusions, their anxiety is contaminated, so their theories are unable to describe You, because You are beyond their material intelligence. You are unique, so You do not have opposites such as doable and undoable, pleasure and pain. What is impossible for You by that power of Yours? Your natural state is without duality, so You can do everything by the power of Yours.
तात्पर्य
ईश्वर स्वयं पूर्ण हैं, इसलिए पूर्ण रूप से दिव्य आनंद (आत्मारामा) से भरपूर हैं। वे दो प्रकार से आनंद का अनुभव करते हैं - जब वे खुश दिखते हैं और जब वे दुखी दिखते हैं। उनमें भेद या विरोधाभास असंभव है क्योंकि केवल उन्हीं से उत्पन्न हुए हैं। ईश्वर सारे ज्ञान, सभी शक्ति, सारी ताकत, वैभव और प्रभाव का भंडार हैं। उनकी शक्तियों की कोई सीमा नहीं है। वे समस्त दिव्य गुणों से पूर्ण हैं, इसलिए भौतिक जगत से जुड़ी कोई भी घृणित चीज उनमें मौजूद नहीं हो सकती है। वे दिव्य और आध्यात्मिक हैं, इसलिए भौतिक सुख और दुख की धारणाएं उन पर लागू नहीं होती हैं।

हमें ईश्वर में विरोधाभास पाकर आश्चर्य नहीं करना चाहिए। वास्तव में कोई विरोधाभास नहीं है। यही उनका सर्वोच्च होने का अर्थ है। क्योंकि वे सर्वशक्तिमान हैं, इसलिए वे सशर्त आत्मा के उनके अस्तित्व या गैर-अस्तित्व के तर्कों के अधीन नहीं हैं। वे अपने भक्तों की रक्षा करके उनके दुश्मनों को मार कर प्रसन्न होते हैं। उन्हें मारना और रक्षा करना दोनों ही पसंद है।

द्वंद्व से ऐसी मुक्ति न केवल भगवान पर लागू होती है बल्कि उनके भक्तों पर भी होती है। वृंदावन में, व्रजभूमि की गोपियाँ, भगवान कृष्ण, ईश्वर के साथ अपने साथ में दिव्य आनंद का आनंद लेती हैं, और जब कृष्ण और बलराम वृंदावन से मथुरा के लिए चले जाते हैं तो उन्हें अलगाव में भी वही दिव्य आनंद महसूस होता है। ईश्वर या उनके शुद्ध भक्तों के लिए भौतिक दुख या सुख का कोई सवाल ही नहीं है, हालाँकि कभी-कभी उनकी दुखी या खुश होने की बात सरसरी तौर पर कही जाती है। जो आत्मारामा है वह दोनों तरह से आनंदित रहता है।

अभक्त लोग सर्वोच्च प्रभु या उनके भक्तों में विद्यमान विरोधाभासों को समझ नहीं पाते। इसलिए भगवद गीता में प्रभु कहते हैं, भक्त्या मामभिजानाति: दिव्य लीलाओं को भक्ति सेवा के माध्यम से समझा जा सकता है; अभक्तों के लिए वे अकल्पनीय हैं। अचिंत्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेट: सर्वोच्च प्रभु और उनका रूप, नाम, लीलाएं और सामग्री अभक्तों के लिए अकल्पनीय हैं और किसी को भी ऐसी वास्तविकताओं को मात्र तार्किक तर्कों से समझने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। वे किसी को भी परम सत्य के बारे में सही निष्कर्ष पर नहीं पहुंचाएंगे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)