श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 9: वृत्रासुर राक्षस का आविर्भाव  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  6.9.35 
अथ तत्र भवान् किं देवदत्तवदिह गुणविसर्गपतित: पारतन्‍त्र्येण स्वकृतकुशलाकुशलं फलमुपाददात्याहोस्विदात्माराम उपशमशील: समञ्जसदर्शन उदास्त इति ह वाव न विदाम: ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
ये हमारे प्रश्न हैं। एक साधारण बद्ध आत्मा भौतिक नियमों के अधीन है और इस प्रकार उसे अपने कर्मों का फल मिलता है। क्या आप, एक साधारण मनुष्य की तरह, इस भौतिक संसार में भौतिक गुणों से उत्पन्न शरीर में मौजूद हैं? क्या आप, काल, पूर्व कर्म आदि के अधीन होकर अच्छे या बुरे कर्मों का भोग करते हैं? या इसके विपरीत, क्या आप यहाँ केवल एक उदासीन गवाह के रूप में उपस्थित हैं, जो आत्मनिर्भर है, सभी भौतिक इच्छाओं से मुक्त है और हमेशा आध्यात्मिक शक्ति से भरा रहता है? हम निश्चित रूप से आपकी वास्तविक स्थिति को नहीं समझ सकते।
 
These are our inquiries. The ordinary conditioned soul is subject to material laws and reaps the results of his actions. Do You exist in this world as ordinary human beings do, in a body produced by material modes? Do You experience good or bad actions as a result of time, past actions, etc.? Or, on the contrary, are You present here as an indifferent witness, self-sufficient, devoid of all material desires and always full of spiritual energy? We certainly cannot understand Your actual position.
तात्पर्य
भगवद्गीता में कृष्ण कहते है कि वे इस भौतिक संसार में दो उद्देश्यों के लिए अवतरित होते हैं, अर्थात् परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृतां - भक्तों को राहत पहुँचाना और राक्षसों या गैर-भक्तों को मारना। ये दोनों प्रकार की क्रियाएँ परम सत्य के लिए समान हैं। जब प्रभु राक्षसों को दंडित करने आते हैं, तो वे उन पर अपना अनुग्रह बरसाते हैं, और उसी प्रकार जब वे अपने भक्तों को मुक्ति देते हैं और उन्हें राहत देते हैं, तो वे अपना अनुग्रह भी बरसाते हैं। इस प्रकार प्रभु बँधी हुई आत्माओं पर समान रूप से अपना अनुग्रह बरसाते हैं। जब कोई बंधी हुई आत्मा दूसरों को राहत देती है तो वह पवित्र रूप से कार्य करती है, और जब वह दूसरों को परेशान करती है तो वह अधर्मी रूप से कार्य करती है, लेकिन प्रभु न तो धार्मिक है न ही अधर्मी; वे हमेशा अपनी आध्यात्मिक शक्ति से परिपूर्ण होते हैं, जिसके द्वारा वे दंडनीय और रक्षित दोनों पर समान दया दिखाते हैं। प्रभु अपाप-विद्धम हैं; वे तथाकथित पापी गतिविधियों की प्रतिक्रियाओं से कभी दूषित नहीं होते हैं। जब कृष्ण इस पृथ्वी पर उपस्थित थे, तो उन्होंने कई शत्रुतापूर्ण गैर-भक्तों को मार डाला, लेकिन वे सभी कोसारूप्य मिला; दूसरे शब्दों में, वे अपने मूल आध्यात्मिक निकायों में लौट आए। जो प्रभु की स्थिति को नहीं जानता वह कहता है कि ईश्वर उसके साथ निर्दयी है लेकिन दूसरों के प्रति दयालु है। वास्तव में प्रभु भगवद्गीता (9.29) में कहते हैं, समोऽहं सर्व-भूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः: "मैं सभी के समान हूँ। कोई भी मेरा शत्रु नहीं है, और कोई भी मेरा मित्र नहीं है।" पर वे यह भी कहते हैं, ये भजन्ति तु माम भक्त्या मयि ते तेषु चाप्य अहम्: "यदि कोई मेरा भक्त बन जाता है और मेरे प्रति पूरी तरह से समर्पण कर देता है, तो मैं उसे विशेष ध्यान देता हूँ।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)