श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 9: वृत्रासुर राक्षस का आविर्भाव  »  श्लोक 29-30
 
 
श्लोक  6.9.29-30 
आत्मतुल्यै: षोडशभिर्विना श्रीवत्सकौस्तुभौ ।
पर्युपासितमुन्निद्रशरदम्बुरुहेक्षणम् ॥ २९ ॥
द‍ृष्ट्वा तमवनौ सर्व ईक्षणाह्लादविक्लवा: ।
दण्डवत् पतिता राजञ्छनैरुत्थाय तुष्टुवु: ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
श्री नारायण, परम पुरुषत्व के आसपास घेरे हुए और उनकी सेवा में तत्पर उनके सोलह पार्षद थे, जो आभूषणों से सजे हुए थे और ठीक उन्हीं के समान दिख रहे थे, लेकिन श्रीवत्स चिन्ह और कौस्तुभ मणि के बिना। हे राजन्! जब सभी देवताओं ने उस मुद्रा में शरदकालीन कमल की पंखुड़ियों के समान नेत्रों और मुस्कान से युक्त श्री भगवान का दर्शन किया तो वे प्रसन्नता से अभिभूत हो गए और तुरंत पृथ्वी पर गिर कर दंडवत् प्रणाम किया। इसके बाद वे धीरे-धीरे उठे और स्तुति करके भगवान को प्रसन्न किया।
 
Sri Bhagavan was surrounded by sixteen of his associates, serving him. He was decked with ornaments and looked like the Lord himself, but was devoid of the Srivatsa mark and the Kaustubhamani. O King! When the demigods saw Sri Bhagavan in that posture, with eyes like the petals of an autumn lotus and a smiling face, they were overwhelmed with joy and immediately fell on the earth and prostrated themselves. Then they slowly got up and pleased the Lord with their prayers.
तात्पर्य
वैकुण्ठलोक में परम भगवान् के चार हाथ होते हैं तथा उनके वक्ष पर श्रीवत्स चिह्न और कौस्तुभ नामक मणि जैसे आभूषण होते हैं। ये परम भगवान् के विशिष्ट प्रतीक चिह्न होते हैं। वैकुण्ठ में भगवान् के निजी सेवक और अन्य भक्त भी समान ही होते हैं, केवल श्रीवत्स चिह्न और कौस्तुभ मणि को छोड़कर।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)