लिंगम एव पश्यामः
कदाचित अभिमानस्तु
देवानाम अपि सन्न इव
प्रायः कालेषु नास्त्य एव
तारतम्येन सोऽपि तु
हम सभी विभिन्न अंशों तक वातानुकूलित हैं, लेकिन हम सोचते हैं कि हम भगवान हैं। यही कारण है कि हम समझ नहीं पाते कि भगवान कौन हैं या उनका आमने-सामने से दर्शन कैसे करें।
