श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 9: वृत्रासुर राक्षस का आविर्भाव  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  6.9.25 
य एक ईशो निजमायया न:
ससर्ज येनानुसृजाम विश्वम् ।
वयं न यस्यापि पुर: समीहत:
पश्याम लिङ्गं पृथगीशमानिन: ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, जिनकी बाह्य शक्ति से हमारी सृष्टि हुई और जिनकी कृपा से हम इस विश्व की सृष्टि को बढ़ाते हैं, निरंतर हमारे समक्ष परमात्मा के रूप में मौजूद हैं, किन्तु हम उनके स्वरूप को नहीं देख पाते। हम उन्हें देखने में असमर्थ होते हैं क्योंकि हम सभी अपने आपको पृथक और स्वतंत्र देवता समझते हैं।
 
The Supreme Personality of Godhead, who created us by His external energy and by whose grace we expand the creation of this universe, is always present before us as the Supreme Personality of Godhead, but we are unable to see His form. We are unable to see Him because we all consider ourselves as separate and independent Gods.
तात्पर्य
यहां यह स्पष्टीकरण दिया गया है कि क्यों बद्ध आत्मा भगवान की परम उपलब्धि का साक्षात्कार नहीं कर सकता। यद्यपि भगवान हमारे समक्ष भगवान कृष्ण या भगवान रामचंद्र के रूप में प्रकट होते हैं और मनुष्य समाज में एक नेता या राजा के रूप में निवास करते हैं, बद्ध आत्मा उन्हें नहीं समझ सकता। अवजानंति माम मुढा मानुषीं तनुमाश्रितम्: दुष्ट (मूढ) भगवान की परम उपलब्धि को उपहास करता है, उन्हें साधारण मनुष्य समझता है। हम कितने ही नगण्य क्यों न हों, हम सोचते हैं कि हम भी भगवान हैं, कि हम एक ब्रह्मांड बना सकते हैं या कि हम दूसरा भगवान बना सकते हैं। यही कारण है कि हम भगवान की परम उपलब्धि को न तो देख सकते हैं और न ही समझ सकते हैं। इस संबंध में, श्रील माधवाचार्य कहते हैं:

लिंगम एव पश्यामः

कदाचित अभिमानस्तु

देवानाम अपि सन्न इव

प्रायः कालेषु नास्त्य एव

तारतम्येन सोऽपि तु

हम सभी विभिन्न अंशों तक वातानुकूलित हैं, लेकिन हम सोचते हैं कि हम भगवान हैं। यही कारण है कि हम समझ नहीं पाते कि भगवान कौन हैं या उनका आमने-सामने से दर्शन कैसे करें।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)