श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 9: वृत्रासुर राक्षस का आविर्भाव  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  6.9.1 
श्रीशुक उवाच
तस्यासन् विश्वरूपस्य शिरांसि त्रीणि भारत ।
सोमपीथं सुरापीथमन्नादमिति शुश्रुम ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
श्री शुकदेव गोस्वामी बोले- देवताओं के पुरोहित विश्वरूप के तीन सिर थे। एक सिर से वे सोमपान करते थे, दूसरे से मदिरापान और तीसरे से भोजन ग्रहण करते थे। हे राजन परीक्षित! ऐसा मैंने विद्वानों से सुना है।
 
Sri Shukdev Goswami said—Vishwarupa, the priest of the gods, had three heads. From one of these he used to drink Soma, from the other he used to drink wine and from the third he used to eat food. O King Parikshit! I have heard this from learned people.
तात्पर्य
स्वर्गलोक, उसके राजा और अन्य निवासियों को या वे किस तरह अपने विभिन्न कर्तव्यों को करते हैं, को व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से नहीं समझ सकता, क्योंकि कोई भी स्वर्गीय ग्रहों पर नहीं जा सकता। हालाँकि आधुनिक वैज्ञानिकों ने कई शक्तिशाली अंतरिक्ष यान आविष्कृत किए हैं, लेकिन वे चाँद पर भी नहीं जा सकते, अन्य ग्रहों की तो बात ही छोडिए। प्रत्यक्ष अनुभव से व्यक्ति मानवीय समझ के दायरे से परे कुछ नहीं सीख सकता। व्यक्ति को अधिकारियों से सुनना चाहिए। इसलिए महान व्यक्ति श्री सुकादेव गोस्वामी कहते हैं, “हे राजा, मैं आपको जो बता रहा हूँ, वह सब मैंने अधिकृत स्रोतों से सुना है।” यह वैदिक प्रणाली है। वैदिक ज्ञान को श्रुति कहा जाता है क्योंकि इसे अधिकारियों से सुनकर ही प्राप्त किया जा सकता है। यह हमारे झूठे प्रायोगिक ज्ञान के क्षेत्र से परे है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)