Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 6.8.4-6: विश्वरूप ने कहा- जब किसी प्रकार का डर हो तो मनुष्य को पहले अपने हाथ-पैरों को धोना चाहिए और फिर "ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा / य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि: / श्रीविष्णु श्रीविष्णु श्रीविष्णु" मंत्र का उच्चारण करते हुए आचमन करना चाहिए। फिर कुश को छूकर और उत्तर दिशा की ओर मुँह करके शांतिपूर्वक बैठ जाना चाहिए। पूरी तरह से शुद्ध होने के बाद, उसे आठ शब्दों वाले मंत्र को अपने शरीर के दाहिनी ओर के आठ अंगों पर और बारह शब्दों वाले मंत्र को हाथों पर स्पर्श करना चाहिए। फिर नारायण-कवच से खुद को इस तरह से बांधना चाहिए - पहले आठ शब्दों वाले मंत्र (ॐ नमो नारायणाय) का उच्चारण करते हुए, पहले शब्द ॐ या प्रणव से शुरू करके, अपने हाथों से अपने शरीर के आठ अंगों को छूना चाहिए - पहले दोनों पैर, फिर क्रमशः घुटने, जांघ, पेट, हृदय, छाती, मुँह और सिर को स्पर्श करना चाहिए। इसके बाद उलटे क्रम में मंत्र का जप करें, यानी आखिरी शब्द ‘य’ से शुरू करें और अपने शरीर के अंगों को भी उलटे क्रम में स्पर्श करें। इन दोनों विधियों को उत्पत्ति-न्यास और संहार-न्यास कहा जाता है। | bhagavat अध्याय 6.8: नारायण-कवच । bhagavat स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
श्रीविश्वरूप उवाच
धौताङ्घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदङ्मुख: ।
कृतस्वाङ्गकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यत: शुचि: ॥ ४ ॥
नारायणपरं वर्म सन्नह्येद् भय आगते ।
पादयोर्जानुनोरूर्वोरुदरे हृद्यथोरसि ॥ ५ ॥
मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादोंङ्कारादीनि विन्यसेत् ।
ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा ॥ ६ ॥
अनुवाद
विश्वरूप ने कहा- जब किसी प्रकार का डर हो तो मनुष्य को पहले अपने हाथ-पैरों को धोना चाहिए और फिर "ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा / य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि: / श्रीविष्णु श्रीविष्णु श्रीविष्णु" मंत्र का उच्चारण करते हुए आचमन करना चाहिए। फिर कुश को छूकर और उत्तर दिशा की ओर मुँह करके शांतिपूर्वक बैठ जाना चाहिए। पूरी तरह से शुद्ध होने के बाद, उसे आठ शब्दों वाले मंत्र को अपने शरीर के दाहिनी ओर के आठ अंगों पर और बारह शब्दों वाले मंत्र को हाथों पर स्पर्श करना चाहिए। फिर नारायण-कवच से खुद को इस तरह से बांधना चाहिए - पहले आठ शब्दों वाले मंत्र (ॐ नमो नारायणाय) का उच्चारण करते हुए, पहले शब्द ॐ या प्रणव से शुरू करके, अपने हाथों से अपने शरीर के आठ अंगों को छूना चाहिए - पहले दोनों पैर, फिर क्रमशः घुटने, जांघ, पेट, हृदय, छाती, मुँह और सिर को स्पर्श करना चाहिए। इसके बाद उलटे क्रम में मंत्र का जप करें, यानी आखिरी शब्द ‘य’ से शुरू करें और अपने शरीर के अंगों को भी उलटे क्रम में स्पर्श करें। इन दोनों विधियों को उत्पत्ति-न्यास और संहार-न्यास कहा जाता है।
Vishwaroop said—Whenever there is an occasion of any kind of fear, a person should first wash his hands and feet and then chant this mantra—Om abhivadi: pavitaro vaa sarvasthaam gato'pi vaa / ya: smareet pundarikaksham sa bahyayaabhyantar: shuchi: / Shri Vishnu Shri Vishnu Shri Vishnu—and rinse his mouth. Then he should touch kusha grass and sit facing north in a calm manner. After being completely pure, he should touch the mantra of eight words to the eight parts of the right side of his body and the mantra of twelve words to his hands. Then tie himself with Narayan-kavach in this way—first chanting the mantra of eight words (Om namo Narayanaya), starting with the first word Om or Pranava, touch all the eight parts of his body with his hands—first touch both feet, then touch knees, thighs, stomach, heart, chest, mouth and head respectively. After this, chant the mantra in reverse order, i.e. start with the last word 'Ya' and touch the body parts in reverse order. These two methods are called Utpatti-Nyaas and Samhaar-Nyaas respectively.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥