एका-देश-स्थितस्य-अग्ने:
ज्योत्स्ना विस्तारिणी यथा
परस्य ब्रह्मण: शक्ति:
तथेदम अखिल जगत
जैसे एक स्थान पर मौजूद आग अपनी रोशनी और गर्मी को सर्वत्र फैला सकती है, वैसे ही सर्वसंपन्न परमेश्वर, परम देवता, अपने आध्यात्मिक निवास में स्थित होते हुए भी, अपनी विभिन्न ऊर्जाओं द्वारा, भौतिक और आध्यात्मिक दोनों लोकों में स्वयं का विस्तार करते हैं। चूँकि कारण और कार्य दोनों परम प्रभु हैं, इसलिए कारण और कार्य में कोई अंतर नहीं है। परिणामस्वरूप, भगवान के आभूषण और हथियार, उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा के विस्तार होने के कारण, उनसे भिन्न नहीं हैं। प्रभु और उनकी विभिन्न रूप में प्रस्तुत की जाने वाली ऊर्जाओं में कोई अंतर नहीं है। इसकी पुष्टि पद्म पुराण में भी की जाती है:
नाम चिन्तामणि: कृष्ण:
चैतन्य-रस-विग्रह:
पूर्ण: शुद्धो नित्य-मुक्तो
अभिन्नत्वान् नाम-नामिनो:
प्रभु का पवित्र नाम प्रभु के समान पूर्ण है, आंशिक नहीं है। "पूर्ण" शब्द का अर्थ है "संपूर्ण"। प्रभु सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ हैं, और इसी तरह, उनका नाम, रूप, गुण, आभूषण और उनसे संबंधित सब कुछ पूर्ण, शुद्ध, शाश्वत और भौतिक संदूषण से मुक्त है। प्रभु के आभूषणों और वाहकों से प्रार्थना करना असत्य नहीं है, क्योंकि वे प्रभु के समान ही अच्छे हैं। चूँकि प्रभु सर्वव्यापी हैं, इसलिए वे हर चीज़ में मौजूद हैं और हर चीज़ उनमें मौजूद है। इसलिए, प्रभु के हथियारों या आभूषणों की पूजा करने पर भी प्रभु की पूजा करने के समान ही प्रभाव पड़ता है। मायावादी प्रभु के रूप को स्वीकार करने से इनकार करते हैं, या वे कहते हैं कि प्रभु का रूप माया है, या झूठा है, लेकिन व्यक्ति को बहुत सावधानी से ध्यान देना चाहिए कि यह स्वीकार्य नहीं है। हालाँकि प्रभु का मूल रूप और उनका अवैयक्तिक विस्तार एक है, लेकिन प्रभु अपना रूप, गुण और निवास शाश्वत रूप से बनाए रखते हैं। इसलिए, यह प्रार्थना कहती है, "पातु सर्वैः स्वरूपैर न: सदा सर्वत्र सम-ग:" - "प्रभु, जो अपने विभिन्न रूपों में सर्वव्यापी हैं, हमें हर जगह सुरक्षित रखें।" प्रभु अपने नाम, रूप, गुणों, विशेषताओं और आभूषणों के द्वारा हमेशा हर जगह विद्यमान रहते हैं, और उन सभी में भक्तों की रक्षा करने की समान शक्ति होती है। श्रील माधवाचार्य इसे इस प्रकार समझाते हैं:
एका एव परो विष्णु:
भूषाहेति ध्वजेष्व अज:
तत्तत्-शक्ति-प्रदत्वेन
स्वयं एव व्यवस्थित:
सत्येनानेन मां देव:
पातु सर्वेश्वरो हरि:
