श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 8: नारायण-कवच  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  6.8.30 
सर्वापद्‌भ्यो हरेर्नामरूपयानायुधानि न: ।
बुद्धीन्द्रियमन:प्राणान् पान्तु पार्षदभूषणा: ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
श्री भगवान के पवित्र नाम, उनके दिव्य रूप, उनके वाहन और आयुध, जो उनके पार्षदों के समान उनकी शोभा बढ़ाते हैं, हमारी बुद्धि, इन्द्रियों, मन और प्राण की सभी प्रकार के संकटों से रक्षा करें।
 
May the holy name, divine form, vehicle and weapons of Sri Bhagavan, which enhance His beauty like His associates, protect our intellect, senses, mind and vital force from all kinds of dangers.
तात्पर्य
भगवान के अनेक प्रकार के सहचारी हैं और उनके शस्त्र और वाहक भी उनमें से ही एक है। आध्यात्मिक दुनिया में, कुछ भी भौतिक नहीं है। तलवार, धनुष, ढाल, चक्र और भगवान के व्यक्तिगत शरीर को सुशोभित करने वाली हर चीज आध्यात्मिक जीवन शक्ति हैं। इसलिए भगवान को अद्वैत ज्ञान कहा जाता है, यह दर्शाता है कि उनके और उनके नामों, रूपों, गुणों, हथियारों आदि में कोई अंतर नहीं है। उनसे संबंधित कुछ भी आध्यात्मिक अस्तित्व की उसी श्रेणी में है। वे सभी आध्यात्मिक रूपों की विविधताओं में भगवान की सेवा में लगे हुए हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)