जैसा कि श्री जयदेव गोस्वामी ने अपने दशावतार-स्तोत्र में वर्णित किया है, भगवान बुद्ध ने प्रत्यक्ष रूप से वैदिक ज्ञान की निंदा की है:
निंदसि यज्ञ-विधेर अहह श्रुति-जात
सदय-हृदय-दर्शिता-पशुघातम्
केशव धृता-बुद्ध-शरीर जय जगदीश हरे
भगवान बुद्ध का उद्देश्य लोगों को जानवरों की हत्या के घृणित कृत्य से बचाना और बेचारे जानवरों को अनावश्यक रूप से मारे जाने से बचाना था। जब पाषंडी लोग वैदिक यज्ञों में बलि देने के बहाने जानवरों को मारकर लोगों को धोखा दे रहे थे, तो भगवान ने कहा, "यदि वैदिक विधि पशु-हत्या की अनुमति देते हैं, तो मैं वैदिक सिद्धांतों को स्वीकार नहीं करता।" इस प्रकार उन्होंने वास्तव में उन लोगों को बचाया जिन्होंने वैदिक सिद्धांतों के अनुसार कार्य किया। इसलिए व्यक्ति को भगवान बुद्ध के सामने आत्मसमर्पण करना चाहिए ताकि वह वेदों के सिद्धांतों के दुरुपयोग से बचने में व्यक्ति की मदद कर सकें।
कलकि अवतार भगवान का वह उग्र अवतार है जो इस कलयुग में जन्मे नास्तिकों के वर्ग को परास्त करते हैं। अब कलियुग की शुरुआत में, कई अधार्मिक सिद्धांत प्रभावी हैं, और जैसे-जैसे कलियुग आगे बढ़ेगा, कई छद्म धार्मिक सिद्धांत निश्चित रूप से पेश किए जाएंगे, और लोग कलियुग की शुरुआत से पहले भगवान कृष्ण द्वारा घोषित वास्तविक धार्मिक सिद्धांतों को भूल जाएंगे, अर्थात् भगवान के चरण कमलों में समर्पण के सिद्धांत। दुर्भाग्य से, कलियुग के कारण, मूर्ख लोग कृष्ण के चरण कमलों में आत्मसमर्पण नहीं करते हैं। यहां तक कि अधिकांश लोग जो धर्म की वैदिक प्रणाली से संबंधित होने का दावा करते हैं, वे वास्तव में वैदिक सिद्धांतों के विरोधी हैं। वे हर दिन इस दलील के साथ एक नए प्रकार के धर्म का निर्माण करते हैं कि जो कुछ भी कोई बनाता है वह भी मुक्ति का एक मार्ग है। नास्तिक लोग आमतौर पर कहते हैं, यता मतः तत पथा। इस दृष्टिकोण के अनुसार, मानव समाज में सैकड़ों और हजारों अलग-अलग राय हैं, और हर राय एक वैध धार्मिक सिद्धांत है। धूर्तों के इस दर्शन ने वेदों में वर्णित धार्मिक सिद्धांतों को मार डाला है, और जैसे-जैसे कलियुग आगे बढ़ेगा इस तरह के दर्शन अधिक प्रभावशाली होते जाएंगे। कलियुग के अंतिम चरण में, केशव का उग्र अवतार कल्कि देव सभी नास्तिकों को मारने और केवल भगवान के भक्तों को बचाने के लिए उतरेगा।
