श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 8: नारायण-कवच  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  6.8.13 
जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्ति-
र्यादोगणेभ्यो वरुणस्य पाशात् ।
स्थलेषु मायावटुवामनोऽव्यात्
त्रिविक्रम: खेऽवतु विश्वरूप: ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
वरुण देवता के भयानक पशुओं से जल में मत्स्य के रूप में भगवान् मुझे बचाएं। अपनी माया का फैलाव करके उन्होंने वामन का स्वरूप लिया। स्थल पर वामन देवता मेरी रक्षा करें। उनके विशाल रूप, विश्वरूप ने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त की है, आकाश में मेरी रक्षा करें।
 
May the Lord who has taken the form of a fish protect me from the ferocious animals who are the attendants of the god Varuna in the water. He has taken the form of Vaman by expanding his Maya. May Vaman-dev protect me on land. May his gigantic form, the Vishwaroop, which conquers the three worlds, protect me in the sky.
तात्पर्य
यह मंत्र जलीय, स्थलीय और आकाशीय जल में भगवान के मत्स्य, वामनादि अवतार एवं विश्वरूप के रूप में सर्वोच्च व्यक्तित्व की सुरक्षा की कामना करता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)