श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 8: नारायण-कवच  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  6.8.12 
ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां
न्यस्ताङ्‌घ्रिपद्म: पतगेन्द्रपृष्ठे ।
दरारिचर्मासिगदेषुचाप-
पाशान् दधानोऽष्टगुणोऽष्टबाहु: ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
सबसे उच्च भगवान, जो पक्षियों के राजा गरुड़ की पीठ पर बैठे हैं और अपने चरण-कमलों से उनका स्पर्श कर रहे हैं, वो आठ हथियारों से युक्त हैं जिनमें शंख, चक्र, ढाल, तलवार, गदा, तीर, धनुष और पाश हैं। आठ भुजाओं वाले ऐसे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान हमेशा मेरी रक्षा करें। वे सर्वशक्तिमान हैं, क्योंकि उन्होंने आठ योगिक शक्तियों (अणिमा, लघिमा, आदि) को पूर्ण रूप से अपने में समाहित कर लिया है।
 
The Supreme Lord is seated on the back of the bird king Garuda and is touching it with His lotus feet. He holds in His hands a conch, discus, shield, sword, mace, arrows, bow and noose. May this eight-armed Supreme Personality of Godhead protect me at all times. He is omnipotent, as He is endowed with the eight yogic powers (Anima, Laghima, etc.).
तात्पर्य
अपने आप को ब्रह्मरूप समझना ही अंहग्रहोपासना कहलाती है। अहंकारोपासना से ईश्वर नहीं बन जाता किन्तु अपने आप को भावत: ब्रह्मरूप समझता है। आत्मारूप से वे पूर्ण ब्रह्म के समान गुणवान हैं यह समझकर नदी के पानी के सदृश समुद्र के पानी से गुण में अभिन्नता कर के इस श्लोक में कहे हुए भगवान् का ध्यान करना चाहिए। तथा उनसे आश्रय लेना चाहिए। ज जीव सदा ही परमेश्वर के अधीन रहते हैं। अत: उनका कर्त्तव्य है कि सर्व प्रकार से भगवान् की कृपा प्राप्त करने के लिये उनकी शरण ग्रहण करें।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)