अकिञ्चनानां हि धनं शिलोञ्छनं
तेनेह निर्वर्तितसाधुसत्क्रिय: ।
कथं विगर्ह्यं नु करोम्यधीश्वरा:
पौरोधसं हृष्यति येन दुर्मति: ॥ ३६ ॥
अनुवाद
हे लोकपालो! सच्चा ब्राह्मण वह होता है जिसके पास कोई भौतिक सम्पत्ति न हो, वह शिलोच्छन वृत्ति से ही अपना पेट पालता है। अर्थात् खेतों में गिरे हुए और बड़े हाट-स्थलों पर गिरे हुए अन्न को बीनता है। इस तरह से गृहस्थ ब्राह्मण जो वास्तव में तपस्या के सिद्धांत का पालन करते हुए स्वयं का और अपने परिवार का भरण करता है और आवश्यक पुण्य कर्म करता रहता है। जो ब्राह्मण पुरोहिती कर्म से धन कमाकर सुखी बनना चाहता है, वह बहुत ही तुच्छ मन वाला होता है। बताओ मैं ऐसी पुरोहिती को कैसे स्वीकार करूँ?
O protectors of the world! A true Brahmin is one who has no material possessions and who earns his livelihood by the profession of shilochana. In other words, he collects the grains that have fallen in the fields and at the big market places. Thus, a householder Brahmin who actually follows the principle of austerity, feeds himself and his family and keeps on doing the necessary pious deeds. A Brahmin who wants to become happy by earning money by doing priestly work is of a very petty mind. Tell me, how can I accept this priesthood?
तात्पर्य
एक प्रथम-श्रेणी का ब्राह्मण अपने शिष्यों या यजमानों से कोई भी पुरस्कार स्वीकार नहीं करता है। तपस्या और तपस्या का पालन करते हुए, वह इसके बजाय कृषि क्षेत्र में जाता है और ब्राह्मणों द्वारा एकत्र किए जाने वाले कृषकों द्वारा छोड़े गए खाद्यान्न को एकत्र करता है। इसी तरह, ऐसे ब्राह्मण बाज़ारों में जाते हैं जहाँ अनाज थोक में खरीदे और बेचे जाते हैं, और वहाँ वे व्यापारियों द्वारा छोड़े गए अनाज को इकट्ठा करते हैं। इस तरह, ऐसे श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने शरीर और परिवार का भरण-पोषण करते हैं। ऐसे पुजारी कभी भी क्षत्रिय या वैश्यों की नकल करते हुए वैभव में जीने के लिए अपने शिष्यों से कुछ भी नहीं मांगते हैं। दूसरे शब्दों में, एक शुद्ध ब्राह्मण स्वेच्छा से गरीबी का जीवन स्वीकार करता है और भगवान् की दया पर पूर्ण निर्भरता में रहता है। बहुत साल पहले की बात नहीं है, नवद्वीप के पास कृष्णानगर में एक ब्राह्मण को स्थानीय जमींदार, राजा कृष्णचंद्र से कुछ मदद की पेशकश की गई थी। ब्राह्मण ने मदद लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि चूंकि वह अपने गृहस्थ जीवन में बहुत खुश थे, इसलिए अपने शिष्यों द्वारा दिया गया चावल लेना और इमली के पत्तों की सब्जियों को पकाना, जमींदार से मदद लेने का कोई सवाल ही नहीं था। निष्कर्ष यह है कि यद्यपि एक ब्राह्मण अपने शिष्यों से बहुत अधिक ऐश्वर्य प्राप्त कर सकता है, उसे अपने पुरोहित के पुरस्कारों का उपयोग अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं करना चाहिए; उसे उनका उपयोग भगवान के परम व्यक्तित्व की सेवा के लिए करना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥