किबा विप्र, किबा न्यासी, शूद्र कैने नाया
ये कृष्ण-तत्व-वत्ता, सेइ ‘गुरु’ हाया
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई ब्राह्मण है, शूद्र है, गृहस्थ है या संन्यासी है। ये सभी भौतिक पदनाम हैं। आध्यात्मिक रूप से उन्नत व्यक्ति का ऐसे पदनामों से कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए, अगर कोई कृष्ण चेतना के विज्ञान में उन्नत है, तो मानव समाज में उसकी स्थिति की परवाह किए बिना, वह आध्यात्मिक गुरु बन सकता है।
