आचार्यो ब्रह्मणो मूर्ति: पिता मूर्ति: प्रजापते: ।
भ्राता मरुत्पतेर्मूर्तिर्माता साक्षात् क्षितेस्तनु: ॥ २९ ॥
दयाया भगिनी मूर्तिर्धर्मस्यात्मातिथि: स्वयम् ।
अग्नेरभ्यागतो मूर्ति: सर्वभूतानि चात्मन: ॥ ३० ॥
अनुवाद
आचार्य, यानी गुरु, जो सभी वैदिक ज्ञान को सिखाता है और पवित्र धागा प्रदान करके दीक्षा देता है, वेदों का ही साक्षात् रूप हैं। इसी तरह, पिता भगवान ब्रह्मा का रूप है; भाई, राजा इंद्र का; माता, पृथ्वी ग्रह; और बहन, दया की साक्षात् रूप हैं। अतिथि धार्मिक सिद्धांतों का प्रतीक है, आमंत्रित अतिथि देवता अग्नि का प्रतीक है, और सभी जीव भगवान विष्णु, परम भगवान का प्रतीक हैं।
Acharya, that is Guru, who teaches all Vedic knowledge and initiates by giving Yajnopaveet, is the Vedas themselves. Similarly, father is the form of Brahma, brother is the form of King Indra, mother is the form of earth, sister is the form of grace, guest is the form of religion, invited guest is the form of Agnidev and all living beings are the form of Lord Vishnu.
तात्पर्य
चाणक्य पंडिता के नैतिक निर्देशों के अनुसार: "आत्मवत सर्व-भूतेषु" अर्थात किसी को भी स्वयं से निम्न नहीं समझना चाहिए क्योंकि परमात्मा प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में निवास करते हैं। अतः सभी को भगवान के मंदिर के रूप में सम्मान देना चाहिए। इस पद में बताया गया है कि किस प्रकार किसी गुरु, पिता, भाई, बहन, अतिथि आदि का सम्मान करना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥