त्रिपिष्टपं किं गणयन्त्यभेद्य-
मन्त्रा भृगूणामनुशिक्षितार्था: ।
न विप्रगोविन्दगवीश्वराणां
भवन्त्यभद्राणि नरेश्वराणाम् ॥ २४ ॥
अनुवाद
शुक्राचार्य के शिष्यों, असुरगणों की पूर्ण निष्ठा गुरु के आदेशों का पालन करने में है, इसलिए देवताओं की अब उन्हें कोई परवाह नहीं है। वस्तव में, वे राजा या अन्य लोग जो ब्राह्मणों, गायों और परम व्यक्तित्व भगवान कृष्ण की दया में दृढ़ विश्वास रखते हैं और सदैव इन तीनों की पूजा करते हैं, वे हमेशा अपनी स्थिति में शक्तिशाली रहते हैं।
The Asuras, the disciples of Shukracharya, being firmly committed to following the teachings of their master, no longer care about the demigods at all. The truth is that a king or any other person who has unwavering faith in the brahmanas, the cows and the mercy of the Supreme Personality of Godhead, Krishna, and always worships these three, remains always powerful in his position.
तात्पर्य
इसके अतिरिक्त, भगवान ब्रह्मा के निर्देशों से समझ में आता है कि प्रत्येक को ब्राह्मणों, भगवान श्रीकृष्ण और गायों की अत्यंत श्रद्धापूर्वक सेवा करनी चाहिए। भगवान सर्वोच्च प्राणी गौ-ब्राह्मण-हितार्थ हैं। वे हमेशा गायों और ब्राह्मणों पर बहुत दया करते हैं। इसलिए, जो कोई भी गोविंद की पूजा करता है, उसे ब्राह्मणों और गायों की सेवा करके उन्हें संतुष्ट करना चाहिए। यदि कोई सरकार ब्राह्मणों, गायों और कृष्ण, गोविंद की पूजा करती है, तो वह कभी भी कहीं नहीं हारती। अन्यथा, इसे हमेशा हर जगह पराजित और निंदा का सामना करना होगा। इस समय, पूरी दुनिया में सरकारों का ब्राह्मणों, गायों और गोविंद के लिए कोई सम्मान नहीं रह गया है, जिसके कारण पूरी दुनिया में अराजक स्थितियां हैं। संक्षेप में, यद्यपि देवता भौतिक वैभव में बहुत शक्तिशाली थे, राक्षसों ने युद्ध में उन्हें पराजित किया क्योंकि देवताओं ने उनके आध्यात्मिक गुरु बृहस्पति जैसे ब्राह्मण का अनादर किया था।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥