श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 7: इन्द्र द्वारा गुरु बृहस्पति का अपमान  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  6.7.23 
मघवन् द्विषत: पश्य प्रक्षीणान् गुर्वतिक्रमात् ।
सम्प्रत्युपचितान् भूय: काव्यमाराध्य भक्तित: ।
आददीरन्निलयनं ममापि भृगुदेवता: ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
हे इंद्र! शुक्राचार्य का तिरस्कार करने के कारण तुम्हारे शत्रु असुर अत्यंत दुर्बल हो गए थे, परंतु अब उन्होंने शुक्राचार्य की भक्तिपूर्वक आराधना की है, इसलिए वे फिर से बलशाली हो गए हैं। अपनी भक्ति द्वारा उन्होंने अपनी शक्ति इतनी बढ़ा ली है कि अब वे मुझसे मेरा धाम (सत्यलोक) तक छीनने की क्षमता रखते हैं।
 
O Indra! Your enemies, the demons, had become very weak due to disrespect towards Shukracharya, but now they have worshipped Shukracharya with great devotion, so they have become powerful again. Through their devotion, they have increased their power so much that they are now capable of taking even my abode (Satyalok) from me.
तात्पर्य
भगवान ब्रह्मा देवताओं को बताना चाहते थे कि गुरु की शक्ति से व्यक्ति इस संसार में सबसे शक्तिशाली बन सकता है, और गुरु की नाराज़गी से वह सब कुछ खो सकता है। इसकी पुष्टि विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के गीत से होती है:

यस्य प्रसादाद्भगवत्-प्रसादो

यस्याप्रसादान्न गति: कुतोऽपि

"आध्यात्मिक गुरु की कृपा से भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है। आध्यात्मिक गुरु की कृपा के बिना, कोई भी प्रगति नहीं कर सकता।" यद्यपि राक्षस भगवान ब्रह्मा की तुलना में तुच्छ हैं, लेकिन अपने गुरु की शक्ति के कारण वे इतने शक्तिशाली थे कि वे भगवान ब्रह्मा से ब्रह्मलोक का हरण भी कर सकते थे। इसलिए हम आध्यात्मिक गुरु से प्रार्थना करते हैं:

मूकं करोति वाचालं

पंगुं लंघयते गिरिं

यत्-कृपा तमहं वन्दे

श्री-गुरुं दीन-तारणं

(मध्य 17.80)

गुरु की कृपा से, एक गूंगा व्यक्ति भी सबसे बड़ा वक्ता बन सकता है, और एक लंगड़ा व्यक्ति भी पहाड़ों को पार कर सकता है। जैसा कि भगवान ब्रह्मा द्वारा सलाह दी गई है, यदि कोई अपने जीवन में सफलता चाहता है तो उसे इस शास्त्रीय नियम को याद रखना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)