श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 7: इन्द्र द्वारा गुरु बृहस्पति का अपमान  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  6.7.21 
श्रीब्रह्मोवाच
अहो बत सुरश्रेष्ठा ह्यभद्रं व: कृतं महत् ।
ब्रह्मिष्ठं ब्राह्मणं दान्तमैश्वर्यान्नाभ्यनन्दत ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
श्री ब्रह्मा बोले, अरे उत्तम देवताओ! तुमने अपनी ऐश्वर्य की मद में, सभा में आने पर बृहस्पति का सत्कार नहीं किया। वे परब्रह्म को जानने वाले और अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखने वाले श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं। इसलिए यह बहुत आश्चर्यजनक है कि तुमने उनके साथ इस तरह का दुर्व्यवहार किया है।
 
Sri Brahma said, O great gods! Due to your pride of wealth, you people did not welcome Brihaspati when he came to the assembly. He is the knower of the Supreme Brahman and has control over the senses, hence he is the best among the Brahmins. Hence it is very surprising that you people have mistreated him in this manner.
तात्पर्य
भगवान ब्रह्मा ने बृहस्पति के ब्राह्मणिक गुणों को पहचाना, जो कि परम ब्रह्म के ज्ञान के कारण देवताओं के आध्यात्मिक गुरु थे। बृहस्पति अपनी इन्द्रियों और मन पर बहुत नियंत्रण रखते थे, और इसलिए वे एक अत्यंत योग्य ब्राह्मण थे। भगवान ब्रह्मा ने देवताओं को इस ब्राह्मण का उचित सम्मान न करने के लिए दंडित किया, जो कि उनके गुरु थे। भगवान ब्रह्मा देवताओं को यह समझाना चाहते थे कि गुरु का किसी भी परिस्थिति में अपमान नहीं किया जाना चाहिए। जब बृहस्पति देवताओं की सभा में प्रवेश किए, तो उन लोगों ने और उनके राजा इंद्र ने उन्हें महत्वहीन समझा। चूँकि वह हर दिन आते थे, उनका विचार था कि उन्हें विशेष सम्मान दिखाने की आवश्यकता नहीं है। जैसा कि कहा जाता है, परिचितता से अनादर पैदा होता है। बहुत नाराज़ होकर, बृहस्पति तुरंत इंद्र के राजमहल से चले गए। इस प्रकार इंद्र के नेतृत्व में सभी देवता बृहस्पति के चरण कमलों में अपराधी बन गए और भगवान ब्रह्मा, इसकी जानकारी होने के कारण, उनकी उपेक्षा के लिए उनकी निंदा की। एक गीत में जिसे हम प्रतिदिन गाते हैं, नरोत्तम दास ठाकुर कहते हैं, चक्षु-दान दिले येई, जन्म जन्म प्रभु सेई: गुरु शिष्य को आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं, और इसलिए गुरु को जीवन-जीवन भर उनके स्वामी के रूप में माना जाना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में गुरु का अनादर नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन देवता, अपनी भौतिक संपत्ति के घमंड में, अपने गुरु का अनादर कर रहे थे। इसलिए श्रीमद-भागवतम (११.१७.२७) सलाह देता है, आचार्यम माँ विजानीयाँ नाऽवमम्येत कर्हिचित्‌ / न मृत्यबुद्धयसूयेत: आचार्य को हमेशा सम्मानपूर्वक प्रणाम करना चाहिए; आचार्य से कभी भी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए, और उन्हें एक सामान्य मनुष्य नहीं समझना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)