श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 7: इन्द्र द्वारा गुरु बृहस्पति का अपमान  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  6.7.15 
अथाहममराचार्यमगाधधिषणं द्विजम् ।
प्रसादयिष्ये निशठ: शीर्ष्णा तच्चरणं स्पृशन् ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
राजा इंद्र ने कहा: इसलिए अब मैं पूरी ईमानदारी और खुले दिल से देवताओं के गुरु बृहस्पति के चरणों में अपना शीश झुकाऊंगा। सात्विक प्रवृति के होने के कारण वे सभी ज्ञान से परिपूर्ण हैं और ब्राह्मणों में श्रेष्ठ हैं। अब मैं उनके चरणों का स्पर्श करूँगा और उन्हें प्रसन्न करने के लिए उनका अभिवादन करूँगा।
 
King Indra said, "So now I will bow my head at the feet of Brihaspati, the Guru of the Gods, with a very open mind and sincere intention. Being Sattvik, he is fully aware of all knowledge and is the best among Brahmins. Now I will touch his feet and bow down with the aim of pleasing him.
तात्पर्य
संज्ञा होते ही महाराज इन्द्र को बोध हुआ कि वे अपने आध्यात्मिक गुरु बृहस्पति के बहुत ही सच्चे शिष्य नहीं थे। इसलिए उन्होंने निर्णय किया कि अब से वे निःशठ होंगे, वे दोहरे भाव वाले नहीं रहेंगे। निःशठः शीर्षण-तद्-चरणम् स्पृशन्: उन्होंने अपने आध्यात्मिक गुरु के चरणों में अपने मस्तक को स्पर्श करने का निर्णय किया। इस उदाहरण से, हमें विष्णुनाथ चक्रवर्ती ठाकुर द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धांत को सीखना चाहिए:

यस्य प्रसादाद् भगवत्-प्रसादो

यस्याप्रसादान् न गतिः कुतोऽपि

"आध्यात्मिक गुरु की कृपा से ही व्यक्ति को कृष्ण की दया का आशीर्वाद प्राप्त होता है। आध्यात्मिक गुरु के अनुग्रह के बिना, कोई भी उन्नति नहीं कर सकता।" एक शिष्य को कभी भी पाखंडी या अपने आध्यात्मिक गुरु के प्रति विश्वासघाती नहीं होना चाहिए। श्रीमद्-भागवतम (11.17.27) में, आध्यात्मिक गुरु को आचार्य भी कहा जाता है। आचार्यम् माम् विजानीयान्: भगवान कहते हैं कि व्यक्ति को आध्यात्मिक गुरु का सम्मान करना चाहिए, उन्हें स्वयं प्रभु के रूप में स्वीकार करना चाहिए। नावमन्येत कर्हिचित्: किसी भी समय आचार्य का अनादर नहीं करना चाहिए। न मर्त्य-बुद्ध्यासूयेत: कभी भी आचार्य को एक साधारण व्यक्ति नहीं समझना चाहिए। परिचय कभी-कभी घृणा उत्पन्न करता है, लेकिन आचार्य के साथ व्यवहार में बहुत सावधानी बरतनी चाहिए। अगधा-धिषणं द्विजम्: आचार्य एक पूर्ण ब्राह्मण होता है और अपने शिष्य की गतिविधियों का मार्गदर्शन करने में उसकी असीमित बुद्धि होती है। इसलिए कृष्ण भगवद-गीता (4.34) में सलाह देते हैं:

तद् विद्धि प्रणिपातेन

परिप्रश्नेन सेवया

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानम्

ज्ञानिनस्तत्त्व-दर्शिनः

"बस एक आध्यात्मिक गुरु के पास जाकर सत्य जानने का प्रयास करें। उससे विनम्रतापूर्वक पूछताछ करें और उसकी सेवा करें। आत्म-साक्षात्कारी आत्मा आपको ज्ञान प्रदान कर सकता है क्योंकि उसने सत्य को देखा है।" व्यक्ति को आध्यात्मिक गुरु के प्रति पूरी तरह से समर्पण करना चाहिए। और सेवा (सेवया) के साथ उसे और अधिक आध्यात्मिक ज्ञान के लिए उससे संपर्क करना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)