यस्य प्रसादाद् भगवत्-प्रसादो
यस्याप्रसादान् न गतिः कुतोऽपि
"आध्यात्मिक गुरु की कृपा से ही व्यक्ति को कृष्ण की दया का आशीर्वाद प्राप्त होता है। आध्यात्मिक गुरु के अनुग्रह के बिना, कोई भी उन्नति नहीं कर सकता।" एक शिष्य को कभी भी पाखंडी या अपने आध्यात्मिक गुरु के प्रति विश्वासघाती नहीं होना चाहिए। श्रीमद्-भागवतम (11.17.27) में, आध्यात्मिक गुरु को आचार्य भी कहा जाता है। आचार्यम् माम् विजानीयान्: भगवान कहते हैं कि व्यक्ति को आध्यात्मिक गुरु का सम्मान करना चाहिए, उन्हें स्वयं प्रभु के रूप में स्वीकार करना चाहिए। नावमन्येत कर्हिचित्: किसी भी समय आचार्य का अनादर नहीं करना चाहिए। न मर्त्य-बुद्ध्यासूयेत: कभी भी आचार्य को एक साधारण व्यक्ति नहीं समझना चाहिए। परिचय कभी-कभी घृणा उत्पन्न करता है, लेकिन आचार्य के साथ व्यवहार में बहुत सावधानी बरतनी चाहिए। अगधा-धिषणं द्विजम्: आचार्य एक पूर्ण ब्राह्मण होता है और अपने शिष्य की गतिविधियों का मार्गदर्शन करने में उसकी असीमित बुद्धि होती है। इसलिए कृष्ण भगवद-गीता (4.34) में सलाह देते हैं:
तद् विद्धि प्रणिपातेन
परिप्रश्नेन सेवया
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानम्
ज्ञानिनस्तत्त्व-दर्शिनः
"बस एक आध्यात्मिक गुरु के पास जाकर सत्य जानने का प्रयास करें। उससे विनम्रतापूर्वक पूछताछ करें और उसकी सेवा करें। आत्म-साक्षात्कारी आत्मा आपको ज्ञान प्रदान कर सकता है क्योंकि उसने सत्य को देखा है।" व्यक्ति को आध्यात्मिक गुरु के प्रति पूरी तरह से समर्पण करना चाहिए। और सेवा (सेवया) के साथ उसे और अधिक आध्यात्मिक ज्ञान के लिए उससे संपर्क करना चाहिए।
