श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 7: इन्द्र द्वारा गुरु बृहस्पति का अपमान  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  6.7.12 
को गृध्येत्पण्डितो लक्ष्मीं त्रिपिष्टपपतेरपि ।
ययाहमासुरं भावं नीतोऽद्य विबुधेश्वर: ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि मैं सतोगुणी देवताओं का राजा हूँ, परंतु थोड़े से ऐश्वर्य से गर्वित और अहंकार से दूषित था। ऐसी स्थिति में भला इस जगत में कौन ऐसा धन लेना चाहेगा जिससे उसका पतन हो? अफ़सोस! मेरे धन और ऐश्वर्य को धिक्कार है!
 
Although I am the king of the gods in the mode of goodness, I have become proud of a little wealth and have been tainted by ego. In such a condition, who will accept this wealth which will lead to his downfall? Alas! Shame on my wealth and prosperity!
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु ने परमेश्वर से प्रार्थना की, "ना धनं ना जनं ना सुंदरीं कवितां वा जगदीश कामये": "हे मेरे प्रभु, मैं भौतिक वैभव या संपत्ति की आकांक्षा नहीं रखता, न ही मैं चाहता हूँ कि बड़ी संख्या में अनुयायी मुझे अपना नेता मानें, न ही मैं चाहता हूँ कि एक बहुत ही सुंदर पत्नी मुझे प्रसन्न करे।" मामा जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद भक्ति अहेतुकी त्विय: "मैं मुक्ति भी नहीं चाहता। मैं केवल यही चाहता हूँ, जीवन के बाद जीवन, आपके प्रभु का एक वफादार सेवक बनूं।" प्रकृति के नियमों के अनुसार, जब कोई अत्यंत समृद्ध होता है तो वह पतित हो जाता है, और यह व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों रूप से सत्य है। देवता सद्गुण में स्थित हैं, लेकिन कभी-कभी वह भी जो सभी देवताओं के राजा, इंद्र राजा के रूप में इतने ऊंचे पद पर स्थित है, भौतिक संपन्नता के कारण गिर जाते हैं। अब हम वास्तव में अमेरिका में यह देख रहे हैं। पूरे अमेरिकी राष्ट्र ने आदर्श मनुष्यों को पैदा करने के लिए प्रयास किए बिना भौतिक संपन्नता में आगे बढ़ने की कोशिश की है। परिणाम यह हुआ कि अमेरिकी अब अमेरिकी समाज की थोक आपराधिकता पर पछता रहे हैं और सोच रहे हैं कि अमेरिका कैसे इतना अराजक और अव्यवहार्य हो गया है। जैसा कि श्रीमद्-भागवतम् (7.5.31) में कहा गया है, न ते विदुः स्वार्थ-गतिं हि विष्णुम: जो व्यक्ति अज्ञान हैं, वे जीवन के लक्ष्य को नहीं जानते, जो कि घर वापस, भगवान के पास लौटना है। इसलिए, व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों रूप से, वे तथाकथित भौतिक सुखों का आनंद लेने की कोशिश करते हैं, और वे शराब और महिलाओं के आदी हो जाते हैं। ऐसे समाज में पैदा होने वाले पुरुष चौथे दर्जे से भी कम होते हैं। वे वरन-संकर के नाम से जानी जाने वाली अवांछित आबादी हैं, और जैसा कि भगवद-गीता में कहा गया है, वरन-संकर आबादी में वृद्धि एक नारकीय समाज बनाती है। यह वह समाज है जिसमें अमेरिकी अब खुद को पाते हैं। हालाँकि, सौभाग्य से, हरे कृष्ण आंदोलन अमेरिका आ गया है, और कई भाग्यशाली युवक इस आंदोलन पर गंभीरता से ध्यान दे रहे हैं, जो प्रथम श्रेणी के चरित्र के आदर्श पुरुषों का निर्माण कर रहा है, ऐसे पुरुष जो मांसाहार, अवैध यौन संबंध, नशा और जुए से पूरी तरह परहेज करते हैं। यदि अमेरिकी लोग अपने राष्ट्र के पतित आपराधिक जीवन पर अंकुश लगाने के बारे में गंभीर हैं, तो उन्हें कृष्ण चेतना आंदोलन को अपनाना होगा और भगवद-गीता (चतुर्-वर्ण्यं मया सृष्टं गुण-कर्म-विभागाश:) में बताए गए मानव समाज के प्रकार को बनाने का प्रयास करना होगा। उन्हें अपने समाज को प्रथम श्रेणी के पुरुषों, द्वितीय श्रेणी के पुरुषों, तृतीय श्रेणी के पुरुषों और चतुर्थ श्रेणी के पुरुषों में विभाजित करना होगा। चूँकि वे अब केवल ऐसे पुरुषों का निर्माण कर रहे हैं जो चौथे दर्जे से कम हैं, तो वे एक आपराधिक समाज के खतरों से कैसे बच सकते हैं? बहुत समय पहले, भगवान इंद्र को अपने आध्यात्मिक गुरु वृहस्पति के प्रति अपने अनादर का पछतावा हुआ। इसी तरह, यह सलाह दी जाती है कि अमेरिकी लोग सभ्यता में अपनी गलत उन्नति पर पछतावा करें। उन्हें आध्यात्मिक गुरु, कृष्ण के प्रतिनिधि से सलाह लेनी चाहिए। अगर वे ऐसा करते हैं, तो वे खुश रहेंगे, और पूरी दुनिया का नेतृत्व करने के लिए उनका एक आदर्श राष्ट्र होगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)