श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 7: इन्द्र द्वारा गुरु बृहस्पति का अपमान  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  6.7.1 
श्रीराजोवाच
कस्य हेतो: परित्यक्ता आचार्येणात्मन: सुरा: ।
एतदाचक्ष्व भगवञ्छिष्याणामक्रमं गुरौ ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
महाराज परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा- हे महामुनि! देवताओं के गुरु बृहस्पति ने देवताओं का परित्याग क्यों किया जो उनके ही शिष्य थे। देवताओं ने अपने गुरु के साथ ऐसा कौन सा अपराध किया? कृपया मुझसे इस घटना का वर्णन करें।
 
Maharaja Parikshit asked Shukdeva Goswami—O great sage! Why did Brihaspati, the Guru of the Gods, abandon the Gods who were his disciples? What crime did the Gods commit against their Guru? Please describe this incident to me.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जी के अनुसार:

सप्तमे गुरुणा त्याक्तैर् - इत्यादि का तात्पर्य है कि कृष्णद्वैपायन व्यासदेव ने कहा है कि इस सातवें अध्याय में यह वर्णन मिलेगा कि कैसे श्री बृहस्पति ने देवताओं को नाराज होकर त्याग दिया, कैसे देवताओं की दैत्यों द्वारा पराजय हुई और कैसे देवताओं ने भगवान ब्रह्मा जी के आदेशानुसार विश्वरूप को अपना पुरोहित बना लिया |

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)