सप्तमे गुरुणा त्याक्तैर् - इत्यादि का तात्पर्य है कि कृष्णद्वैपायन व्यासदेव ने कहा है कि इस सातवें अध्याय में यह वर्णन मिलेगा कि कैसे श्री बृहस्पति ने देवताओं को नाराज होकर त्याग दिया, कैसे देवताओं की दैत्यों द्वारा पराजय हुई और कैसे देवताओं ने भगवान ब्रह्मा जी के आदेशानुसार विश्वरूप को अपना पुरोहित बना लिया |
