श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  6.4.54 
श्रीशुक उवाच
इत्युक्त्वा मिषतस्तस्य भगवान् विश्वभावन: ।
स्वप्नोपलब्धार्थ इव तत्रैवान्तर्दधे हरि: ॥ ५४ ॥
 
 
अनुवाद
श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा: जब सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्रष्टा, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान हरि प्रजापति दक्ष के सामने इस प्रकार बोल चुके तो वे तुरंत गायब हो गए, मानो वे स्वप्न में अनुभव की गई कोई वस्तु हों।
 
श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा: जब सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्रष्टा, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान हरि प्रजापति दक्ष के सामने इस प्रकार बोल चुके तो वे तुरंत गायब हो गए, मानो वे स्वप्न में अनुभव की गई कोई वस्तु हों।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध छह के अंतर्गत चौथा अध्याय समाप्त होता है ।
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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