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श्लोक 6.4.52  |
मिथुनव्यवायधर्मस्त्वं प्रजासर्गमिमं पुन: ।
मिथुनव्यवायधर्मिण्यां भूरिशो भावयिष्यसि ॥ ५२ ॥ |
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| अनुवाद |
| अब नर और मादा के रूप में यौन जीवन में एक हो जाओ और इस तरह यौन संबंधों के द्वारा तुम इस कन्या के गर्भ से जनसंख्या वृद्धि के लिए सैकड़ों संतानें पैदा कर सकोगे। |
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| अब नर और मादा के रूप में यौन जीवन में एक हो जाओ और इस तरह यौन संबंधों के द्वारा तुम इस कन्या के गर्भ से जनसंख्या वृद्धि के लिए सैकड़ों संतानें पैदा कर सकोगे। |
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