श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  6.4.5 
द्रुमेभ्य: क्रुध्यमानास्ते तपोदीपितमन्यव: ।
मुखतो वायुमग्निं च ससृजुस्तद्दिधक्षया ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
जल में दीर्घ काल तक तपस्या करने के कारण प्रचेतागण वृक्षों पर अत्यंत कुपित थे। उन्हें भस्म कर देने की उत्कट अभिलाषा से उन्होंने अपने मुखों से आँधी और आग उत्पन्न की।
 
जल में दीर्घ काल तक तपस्या करने के कारण प्रचेतागण वृक्षों पर अत्यंत कुपित थे। उन्हें भस्म कर देने की उत्कट अभिलाषा से उन्होंने अपने मुखों से आँधी और आग उत्पन्न की।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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