श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  6.4.5 
द्रुमेभ्य: क्रुध्यमानास्ते तपोदीपितमन्यव: ।
मुखतो वायुमग्निं च ससृजुस्तद्दिधक्षया ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
जल में दीर्घ काल तक तपस्या करने के कारण प्रचेतागण वृक्षों पर अत्यंत कुपित थे। उन्हें भस्म कर देने की उत्कट अभिलाषा से उन्होंने अपने मुखों से आँधी और आग उत्पन्न की।
 
The Prachetagans were extremely angry with the trees for performing penance in water for a long time. With the desire to burn them to ashes, they produced air and fire from their mouths.
तात्पर्य
यहाँ तपो-दीपित-मन्यवः शब्द से पता चलता है कि जो व्यक्ति कठोर तपस्या (तपस्या) से गुजरते हैं, उन्हें महान रहस्यमय शक्ति प्राप्त होती है, जैसा कि प्रचेताओं ने दिखाया, जिन्होंने अपने मुंह से आग और हवा पैदा की। यद्यपि भक्त कठोर तपस्या करते हैं, फिर भी वे विमनायवाः, साधवः हैं, जिसका अर्थ है कि वे कभी क्रोधित नहीं होते हैं। वे हमेशा अच्छे गुणों से सजे रहते हैं। भागवतम् (3.25.21) कहता है:

तितिक्षवः कारुणिकाः

सुहृदः सर्व-देहिनाम्

अजात-शत्रवः शान्ताः

साधवः साधु-भूषणाः

एक साधु, एक भक्त, कभी क्रोधित नहीं होता है। वास्तव में तपस्या, तपस्या करने वाले भक्तों की वास्तविक विशेषता क्षमा है। यद्यपि एक वैष्णव के पास तपस्या में पर्याप्त शक्ति होती है, परन्तु कठिनाई में पड़ने पर भी वह क्रोधित नहीं होता है। यदि कोई तपस्या करता है लेकिन वैष्णव नहीं बनता है, तो वह अच्छे गुणों का विकास नहीं करता है। उदाहरण के लिए, हिरण्यकश्यपु और रावण ने भी महान तपस्या की, परन्तु उन्होंने ऐसा अपनी राक्षसी प्रवृत्तियों को प्रदर्शित करने के लिए किया। प्रभु के गौरव का प्रचार करते समय वैष्णवों को कई विरोधियों का सामना करना पड़ता है, पर श्री चैतन्य महाप्रभु सलाह देते हैं कि प्रचार करते समय वे क्रोधित न हों। भगवान चैतन्य महाप्रभु ने यह सूत्र दिया है: तृणाद् अपि सुनिचेन तरोर अपि सहिष्णुना / अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः। “किसी को भी सड़क पर तिनके से भी नीचा समझकर मन की विनम्र अवस्था में प्रभु के पवित्र नाम का जाप करना चाहिए; किसी को भी पेड़ से अधिक सहनशील होना चाहिए, मिथ्या प्रतिष्ठा के किसी भी भाव से रहित होना चाहिए और सभी को सम्मान देने के लिए तैयार रहना चाहिए। मन की ऐसी अवस्था में कोई भी प्रभु के पवित्र नाम का लगातार जप कर सकता है।” प्रभु के गौरव का प्रचार करने में संलग्न लोगों को घास से अधिक विनम्र होना चाहिए और वृक्ष से अधिक सहनशील होना चाहिए; तब वे बिना किसी कठिनाई के प्रभु के गौरव का प्रचार कर सकते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)