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श्लोक 6.4.5  |
द्रुमेभ्य: क्रुध्यमानास्ते तपोदीपितमन्यव: ।
मुखतो वायुमग्निं च ससृजुस्तद्दिधक्षया ॥ ५ ॥ |
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| अनुवाद |
| जल में दीर्घ काल तक तपस्या करने के कारण प्रचेतागण वृक्षों पर अत्यंत कुपित थे। उन्हें भस्म कर देने की उत्कट अभिलाषा से उन्होंने अपने मुखों से आँधी और आग उत्पन्न की। |
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| जल में दीर्घ काल तक तपस्या करने के कारण प्रचेतागण वृक्षों पर अत्यंत कुपित थे। उन्हें भस्म कर देने की उत्कट अभिलाषा से उन्होंने अपने मुखों से आँधी और आग उत्पन्न की। |
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