श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  6.4.47 
अहमेवासमेवाग्रे नान्यत् किञ्चान्तरं बहि: ।
संज्ञानमात्रमव्यक्तं प्रसुप्तमिव विश्वत: ॥ ४७ ॥
 
 
अनुवाद
इस विराट ब्रह्मांड के प्रकट होने से पहले मैं अपने विशिष्ट आध्यात्मिक गुणों के साथ अकेला था। उस समय चेतना अप्रकट थी, ठीक वैसे ही जैसे नींद के दौरान किसी व्यक्ति की चेतना छिपी रहती है।
 
Before the creation of this vast universe, I alone existed with my special spiritual powers. Consciousness had not manifested then, just as a person's consciousness remains unmanifested during sleep.
तात्पर्य
शब्द अहं किसी व्यक्ति का संकेत करता है। जैसा कि वेदों में समझाया गया है, नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानां (कठ उपनिषद 2.2.13): प्रभु असंख्य शाश्वत के बीच श्रेष्ठ शाश्वत है और असंख्य जीवों के बीच श्रेष्ठ चैतन्यमान है। प्रभु एक ऐसा व्यक्ति है जिसकी अवैयक्तिक विशेषताएँ भी हैं। जैसा कि श्रीमद-भागवतम (1.2.11) में कहा गया है:

वदन्ति तत तत्वविदस्तत्वं यज्ज्ञानमद्वयम्

ब्रह्मेति परमात्मेतिभगवानिति शब्द्यते

"पूर्ण तत्व को जानने वाले विद्वान अध्यात्मवादी इस अद्वैत तत्व को ब्रह्म, परमात्मा या भगवान कहते हैं।' परमात्मा और अवैयक्तिक ब्रह्म के बारे में विचार सृजन के बाद उभरे; सृजन से पहले, केवल सर्वोच्च भगवान का व्यक्तित्व ही अस्तित्व में था। जैसा कि भगवद-गीता (18.55) में दृढ़ता से घोषित किया गया है, प्रभु को केवल भक्ति-योग से ही समझा जा सकता है। अंतिम कारण, सृजन का सर्वोच्च कारण, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व है, जिसे केवल भक्ति-योग से ही समझा जा सकता है। उसे सैद्धांतिक दार्शनिक शोध या ध्यान से नहीं समझा जा सकता, क्योंकि ये सभी प्रक्रियाएँ भौतिक सृजन के बाद अस्तित्व में आईं। सर्वोच्च भगवान की अवैयक्तिक और स्थानीय अवधारणाएँ कमोबेश भौतिक रूप से दूषित हैं। इसलिए, वास्तविक आध्यात्मिक प्रक्रिया भक्ति-योग है। जैसा कि भगवान कहते हैं, भक्त्या मामभिजानाति: "केवल भक्तिपूर्ण सेवा से ही मुझे समझा जा सकता है।" सृजन से पहले, प्रभु एक व्यक्ति के रूप में विद्यमान थे, जैसा कि यहाँ शब्द अहं से संकेत मिलता है। जब प्रजापति दक्ष ने उन्हें एक व्यक्ति के रूप में देखा, जो खूबसूरती से कपड़े पहने और अलंकृत थे, तो उन्होंने वास्तव में भक्तिपूर्ण सेवा के माध्यम से इस शब्द अहं का अर्थ अनुभव किया।

प्रत्येक व्यक्ति शाश्वत है। क्योंकि प्रभु कहते हैं कि वह सृजन से पहले (अग्रे) एक व्यक्ति के रूप में विद्यमान थे और विनाश के बाद भी विद्यमान रहेंगे, प्रभु अनंत काल तक एक व्यक्ति हैं। इसलिए श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर श्रीमद-भागवतम (10.9.13-14) से इन श्लोकों को उद्धृत करते हैं:

ना चान्तर न बहिर्यस्यना पूर्वं नापि चापरम्

पूर्वापरं बहिश्चान्तर्जगतो यो जगच च यः

तं मत्वात्मजमव्यक्तंमार्त्यलिंगमधोक्षजम्

गोपीकूलूखले दाम्नाबबन्ध प्राकृतं यथा

भगवान का व्यक्तित्व वृंदावन में माता यशोदा के पुत्र के रूप में प्रकट हुआ, जो प्रभु को रस्सी से उसी तरह बांधते थे जैसे कोई साधारण माता भौतिक बालक को बांधती है। भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व (सच्चिदानंद-विग्रह) के स्वरूप के लिए वास्तव में बाह्य और आंतरिक का कोई विभाजन नहीं है, लेकिन जब वह अपने स्वयं के रूप में प्रकट होते हैं तो बुद्धिहीन उन्हें एक साधारण व्यक्ति समझते हैं। अवजानंती माम मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्: हालाँकि वह अपने स्वयं के शरीर में आते हैं, जो कभी नहीं बदलता है, मूढ, बुद्धिहीन, सोचते हैं कि अवैयक्तिक ब्रह्म ने किसी व्यक्ति के रूप में आने के लिए भौतिक शरीर धारण किया है। साधारण जीव भौतिक शरीर ग्रहण करते हैं, लेकिन भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व ऐसा नहीं करता है। चूँकि भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व सर्वोच्च चेतना है, इसलिए यहाँ कहा गया है कि संज्ञान-मात्रम, मूल चेतना, कृष्ण चेतना, सृजन से पहले अप्रकट थी, हालाँकि भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की चेतना ही सब कुछ का मूल है। भगवान भगवद-गीता (2.12) में कहते हैं, "ऐसा कोई समय नहीं था जब मैं अस्तित्व में नहीं था, न आप, न ये सभी राजा; और न ही भविष्य में हममें से कोई भी अस्तित्व नहीं रहेगा।" इस प्रकार भगवान का व्यक्ति अतीत, वर्तमान और भविष्य में परम सत्य है।

इस संबंध में माध्वाचार्य मत्स्य पुराण से दो श्लोकों को उद्धृत करते हैं:

नाना-वर्णो हरिस्त्व एको

बहु-शीर्ष-भुजोरूपात्

आसील्लये तदन्यत्तु

सूक्ष्म-रूपं श्रियम विना

असुप्तः सुप्त इव च

मिलिताक्षोऽभवद्धरिः

अन्यत्रानदाराद विष्णौ

श्रीश्च लीनैव कथ्यते

सूक्ष्मत्वेन हरौ स्थानाल

लीनमन्यदपीष्यते

भगवान विष्णु के विभिन्न रंग हैं, और उनके रूप के कारण उनके कई सिर और हाथ हैं। विनाश के समय, वह अन्य सब कुछ से विलुप्त हो जाता है, और सूक्ष्म रूप से, लक्ष्मी से रहित होता है। हरि सोया हुआ प्रतीत होता है, लेकिन वास्तव में वह नहीं सो रहा होता है, और उसकी आँखें बंद होती हैं। विष्णु के प्रति अनादर के अलावा अन्यत्र लक्ष्मी भी लुप्त हो जाती है। हरि के रूप में सूक्ष्म होने से अन्य सब कुछ भी नष्ट हो जाता है।

सब कुछ के अंत के बाद सब कुछ का नाश हो जाता है, सब कुछ का विनाश हो जाता है, परन्तु परम प्रभु अपने सच्चिदानंद विग्रह के कारण अपने मूल रूप में रहते हैं, लेकिन अन्य जीवित प्राणियों में भौतिक शरीर होते हैं, इसलिए मूल पदार्थ पदार्थ में मिल जाता है, और आत्मा का सूक्ष्म रूप प्रभु के शरीर में ही रहता है। प्रभु कभी नहीं सोते, लेकिन सामान्य जीवित प्राणी अगली सृष्टि तक सोते रहते हैं। एक बुद्धिहीन व्यक्ति सोचता है कि सब कुछ के विनाश के बाद परम प्रभु का वैभव नष्ट हो जाता है, लेकिन ऐसा नहीं है। भगवान की सर्वोच्च ईश्वरता का वैभव आध्यात्मिक दुनिया में हमेशा रहता है, सिर्फ भौतिक दुनिया में ही सब कुछ विलीन हो जाता है। ब्रह्मलीन, जो कि परम ब्रह्म में विलीन हो जाता है, वास्तव में लीन या नष्ट नहीं होता है, क्योंकि ब्रह्म की प्रभा में बना सूक्ष्म रूप भौतिक सृजन के बाद भौतिक दुनिया में वापस आएगा और फिर से भौतिक रूप ले लेगा। इसे भूतवा भूतवा प्रलीयते के रूप में वर्णित किया गया है। जब भौतिक शरीर का नाश हो जाता है, तो आत्मा एक सूक्ष्म रूप में रहती है, जो बाद में एक और भौतिक शरीर ग्रहण कर लेती है। बंधी हुई आत्माओं के लिए यह सच है, लेकिन सर्वोच्च ईश्वरता हमेशा अपनी मूल चेतना और आध्यात्मिक शरीर में रहती है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)