| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य » अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ » श्लोक 46 |
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| | | | श्लोक 6.4.46  | तपो मे हृदयं ब्रह्मंस्तनुर्विद्या क्रियाकृति: ।
अङ्गानि क्रतवो जाता धर्म आत्मासव: सुरा: ॥ ४६ ॥ | | | | | | अनुवाद | | हे ब्राह्मण! ध्यान रूप में तपस्या ही मेरा हृदय है, स्तुतियाँ तथा मंत्र के रूप में वैदिक ज्ञान ही मेरा शरीर है और आध्यात्मिक कार्य तथा आनन्दानुभूतियाँ ही मेरा वास्तविक स्वरूप हैं। उचित रीति से संपन्न हुए कर्मकांड, यज्ञ मेरे शरीर के कई अंग हैं। पुण्य या आध्यात्मिक कार्यों से उत्पन्न अदृश्य सौभाग्य ही मेरा मन है, विविध विभागों में मेरे आदेशों को लागू करने वाले देवता ही मेरे आत्मा और जीवन हैं। | | | | हे ब्राह्मण! ध्यान रूप में तपस्या ही मेरा हृदय है, स्तुतियाँ तथा मंत्र के रूप में वैदिक ज्ञान ही मेरा शरीर है और आध्यात्मिक कार्य तथा आनन्दानुभूतियाँ ही मेरा वास्तविक स्वरूप हैं। उचित रीति से संपन्न हुए कर्मकांड, यज्ञ मेरे शरीर के कई अंग हैं। पुण्य या आध्यात्मिक कार्यों से उत्पन्न अदृश्य सौभाग्य ही मेरा मन है, विविध विभागों में मेरे आदेशों को लागू करने वाले देवता ही मेरे आत्मा और जीवन हैं। | | ✨ ai-generated | | |
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