श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  6.4.44 
प्रीतोऽहं ते प्रजानाथ यत्तेऽस्योद्बृंहणं तप: ।
ममैष कामो भूतानां यद्भ‍ूयासुर्विभूतय: ॥ ४४ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रजापति दक्ष! तुमने संसार के लिए अच्छा काम किया है। मेरा भी मन यही चाहता है कि इस दुनिया में सभी जीव सुखी रहें। इसलिए मैं तुमसे बहुत खुश हूँ, तुम दुनिया के लिए अच्छे काम करने की कोशिश में लगे हुए हो इसलिए मैं तुमसे खुश हूँ।
 
O Prajapati Daksh! You have performed severe penance for the welfare and growth of the world. I also wish that every creature in this world should be happy. Therefore, I am very pleased with you, because you are trying to fulfill my wish for the welfare of the entire world.
तात्पर्य
सृष्टि के प्रत्येक विघटन के बाद, सभी जीवधारी कारणोदकशायी विष्णु के शरीर में आश्रय लेते हैं, और सृष्टि फिर से होने पर, वे अपनी विभिन्न प्रजातियों में अपने कार्यों को फिर से शुरू करने के लिए उनके शरीर से बाहर निकलते हैं। सृष्टि इस तरह से क्यों घटित होती है कि जीवधारियों को भौतिक प्रकृति द्वारा उन पर थोपे गए त्रिविध दुखों को सहने के लिए वातानुकूलित जीवन में डाल दिया जाता है? यहाँ प्रभु दक्ष से कहते हैं, "तुम सभी जीवधारियों को लाभ पहुँचाना चाहते हो, और यह मेरी इच्छा भी है।" जो जीवधारी भौतिक दुनिया के संपर्क में आते हैं उनका उद्देश्य सही होना है। इस भौतिक दुनिया के भीतर सभी जीवधारियों ने प्रभु की सेवा के विरुद्ध विद्रोह किया है, और इसलिए वे इस भौतिक दुनिया के भीतर हमेशा के लिए बंधे रहते हैं, नित्य-बद्ध, बार-बार जन्म लेते हैं। निश्चित रूप से उनके मुक्त होने का एक मौका है, लेकिन फिर भी, वातानुकूलित आत्माएँ इस अवसर का लाभ नहीं उठाती, और वे इंद्रिय सुख के जीवन में बने रहते हैं, और इस तरह उन्हें बार-बार जन्म और मृत्यु से दंडित किया जाता है। यह प्रकृति का नियम है। जैसे प्रभु भगवद गीता (7.14) में कहते हैं:

दैवी ह्येषा गुणमयी

मम माया दुरात्यया

मामेव ये प्रपद्यन्ते

मायामेतां तरन्ति ते

"मेरी यह दिव्य ऊर्जा, भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों से मिलकर बनी है, को पार करना मुश्किल है। लेकिन जो लोग मुझमें समर्पण कर चुके हैं वे आसानी से इसे पार कर सकते हैं।" भगवद गीता (15.7) में अन्यत्र, प्रभु कहते हैं:

मामेवांशो जीवलोके

जीवभूतः सनातनः

मनः षष्ठानीन्द्रियाणि

प्रकृतिस्थानि कर्षति

"इस वातानुकूलित दुनिया में जीवधारी मेरे शाश्वत, अंश हैं। वातानुकूलित जीवन के कारण, वे मन सहित छह इंद्रियों के साथ बहुत संघर्ष कर रहे हैं।" भौतिक दुनिया के भीतर जीव की अस्तित्व की लड़ाई उसकी विद्रोही प्रकृति के कारण है। जब तक कोई जीवधारी कृष्ण के सामने समर्पण नहीं करता, उसे संघर्ष के इस जीवन को जारी रखना चाहिए।

कृष्ण चेतना आंदोलन कोई सनक नहीं है। यह सभी वातानुकूलित आत्माओं के कल्याण को बढ़ावा देने के लिए एक वास्तविक आंदोलन है जिसका उद्देश्य सभी को कृष्ण चेतना के मंच पर ऊपर उठाना है। यदि कोई इस मंच पर नहीं आता है, तो उसे भौतिक अस्तित्व में हमेशा बने रहना चाहिए, कभी ऊपरी ग्रहों में और कभी निचले ग्रहों में। जैसा कि चैतन्य-चरितामृत (मध्य 20.118) में पुष्टि की गई है, कभु स्वार्गे उठाय, कभु नरके डुबाय: वातानुकूलित आत्मा कभी अज्ञान में उतरती है और कभी इससे अपेक्षाकृत मुक्त होकर कुछ राहत पाती है। यही वातानुकूलित आत्मा का जीवन है।

प्रजापति दक्ष वातानुकूलित आत्माओं को उन्हें मुक्ति का मौका देने के लिए जीवन देने का प्रयास करके उन्हें लाभ पहुँचाने की कोशिश कर रहे हैं। मुक्ति का अर्थ है कृष्ण के प्रति समर्पण। यदि कोई बच्चों को कृष्ण के प्रति समर्पण करने के उद्देश्य से पैदा करता है, तो पितृत्व बहुत अच्छा है। इसी तरह, जब आध्यात्मिक गुरु वातानुकूलित आत्माओं को कृष्ण चेतना बनने के लिए प्रशिक्षित करता है, तो उसकी स्थिति सफल होती है। यदि कोई वातानुकूलित आत्माओं को कृष्ण चेतना बनने का मौका देता है, तो उसकी सभी गतिविधियों को भगवान कृष्ण द्वारा अनुमोदित किया जाता है, जो अत्यधिक प्रसन्न हैं, जैसा कि यहाँ बताया गया है (प्रितोऽहम्)। पिछले आचार्यों के उदाहरणों का पालन करते हुए, कृष्ण चेतना आंदोलन के सभी सदस्यों को वातानुकूलित आत्माओं को कृष्ण चेतना बनने के लिए प्रेरित करके और ऐसा करने के लिए उन्हें सभी सुविधाएँ देकर लाभ पहुँचाने का प्रयास करना चाहिए। इस तरह की गतिविधियाँ वास्तविक कल्याणकारी कार्य करती हैं। ऐसी गतिविधियों से, एक उपदेशक या कोई भी व्यक्ति जो कृष्ण चेतना फैलाने का प्रयास करता है, उसे भगवान कृष्ण द्वारा पहचाना जाता है। जैसा कि स्वयं प्रभु भगवद गीता (18.68-69) में कहते हैं:

य इदं परमं गुह्यं

मद्भक्तेष्वभिधास्यति

भक्तिं मयि परां कृत्वा

मामेवैष्यत्यसंशयः

न च तस्मान्मनुष्येषु

कश्चिन्मे प्रियकृत्तामः

भावित न च मे तस्माद्

अन्यः प्रियतर भूवि

"जो भक्तों को सर्वोच्च रहस्य बताता है, उसे भक्ति सेवा की गारंटी है, और अंत में वह मेरे पास वापस आ जाएगा। इस दुनिया में मुझसे ज्यादा प्रिय कोई सेवक नहीं है, और न ही कभी कोई और प्रिय होगा।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)