Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 6.4.35-39: श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : अपने भक्तों के प्रति अत्यधिक स्नेह रखने वाले भगवान् हरि, दक्ष द्वारा की गई स्तुतियों से अत्यंत प्रसन्न हुए और अघमर्षण नामक पवित्र स्थान पर प्रकट हुए। हे श्रेष्ठ कुरुवंश के राजा परीक्षित! भगवान् के चरणकमल उनके वाहन गरुड़ के कंधों पर टिके हुए थे और वे अपनी आठ लम्बी, शक्तिशाली, बेहद सुंदर भुजाओं के साथ प्रकट हुए। उनके हाथों में चक्र, शंख, तलवार, ढाल, बाण, धनुष, रस्सी और गदा थी - प्रत्येक हाथ में एक अलग हथियार था, जो चमक रहा था। उनके वस्त्र पीले थे और उनकी काया गहरे नीले रंग की थी। उनकी आँखें और चेहरा बहुत हर्षित थे और गले से पैरों तक फूलों की एक लंबी माला लटकी हुई थी। उनके सीने को कौस्तुभ मणि और श्रीवत्स के चिह्न से सजाया गया था। उनके सिर पर एक शानदार गोल हेलमेट था और उनके कानों को शार्क जैसी झुमकों से सजाया गया था। ये सभी आभूषण असाधारण रूप से सुंदर थे। भगवान ने अपनी कमर पर एक सुनहरी पेटी, बाहों पर कंगन, उंगलियों पर अंगूठियाँ और पैरों पर पायल पहन रखी थी। इस तरह विभिन्न आभूषणों से सजे भगवान हरि, जो तीनों लोकों के सभी जीवों को आकर्षित करते हैं, पुरुषोत्तम के रूप में जाने जाते हैं। उनके साथ नारद, नंद और स्वर्ग के राजा इंद्र के नेतृत्व में सभी प्रमुख देवता और सिद्धलोक, गंधर्वलोक और चारणलोक जैसे विभिन्न उच्च ग्रह प्रणालियों के निवासी भी थे। भगवान के दोनों ओर और उनके पीछे भी स्थित ये भक्त लगातार उनकी स्तुति कर रहे थे। | bhagavat अध्याय 6.4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ । bhagavat स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : अपने भक्तों के प्रति अत्यधिक स्नेह रखने वाले भगवान् हरि, दक्ष द्वारा की गई स्तुतियों से अत्यंत प्रसन्न हुए और अघमर्षण नामक पवित्र स्थान पर प्रकट हुए। हे श्रेष्ठ कुरुवंश के राजा परीक्षित! भगवान् के चरणकमल उनके वाहन गरुड़ के कंधों पर टिके हुए थे और वे अपनी आठ लम्बी, शक्तिशाली, बेहद सुंदर भुजाओं के साथ प्रकट हुए। उनके हाथों में चक्र, शंख, तलवार, ढाल, बाण, धनुष, रस्सी और गदा थी - प्रत्येक हाथ में एक अलग हथियार था, जो चमक रहा था। उनके वस्त्र पीले थे और उनकी काया गहरे नीले रंग की थी। उनकी आँखें और चेहरा बहुत हर्षित थे और गले से पैरों तक फूलों की एक लंबी माला लटकी हुई थी। उनके सीने को कौस्तुभ मणि और श्रीवत्स के चिह्न से सजाया गया था। उनके सिर पर एक शानदार गोल हेलमेट था और उनके कानों को शार्क जैसी झुमकों से सजाया गया था। ये सभी आभूषण असाधारण रूप से सुंदर थे। भगवान ने अपनी कमर पर एक सुनहरी पेटी, बाहों पर कंगन, उंगलियों पर अंगूठियाँ और पैरों पर पायल पहन रखी थी। इस तरह विभिन्न आभूषणों से सजे भगवान हरि, जो तीनों लोकों के सभी जीवों को आकर्षित करते हैं, पुरुषोत्तम के रूप में जाने जाते हैं। उनके साथ नारद, नंद और स्वर्ग के राजा इंद्र के नेतृत्व में सभी प्रमुख देवता और सिद्धलोक, गंधर्वलोक और चारणलोक जैसे विभिन्न उच्च ग्रह प्रणालियों के निवासी भी थे। भगवान के दोनों ओर और उनके पीछे भी स्थित ये भक्त लगातार उनकी स्तुति कर रहे थे।
Sri Sukadeva Gosvami said: Lord Hari, who is very affectionate towards His devotees, was very pleased with the prayers offered by Dakṣa, and therefore He appeared at the sacred place called Aghamarashana. O great Kuru descendant King Parīkṣit, the Lord's lotus feet were placed on the shoulders of His vehicle Garuḍa, and He appeared with His eight long, strong and extremely beautiful arms. In His hands He held a discus, a conch, a sword, a shield, an arrow, a bow, a rope and a mace—each hand had a different weapon and all of them were glittering. His clothes were yellow and the color of His body was dark blue. His eyes and face were very charming and a long garland of flowers hung from His neck to His feet. His chest was adorned with the Kaustubha gem and the Śrīvatsa mark. He wore a huge round crown on His head and His ears were adorned with earrings resembling fishes. All these ornaments were extraordinarily beautiful. The Lord wore a gold belt around His waist, ornaments on His arms, rings on His fingers and anklets on His feet. Thus adorned with various ornaments, Lord Hari, who attracts the living entities of the three worlds, is called Purushottam. He was accompanied by great devotees like Narada, Nanda, and the king of heaven Indra, and other prominent demigods and the inhabitants of the higher worlds, such as Siddhaloka, Gandharvaloka and Charanaloka. These devotees, situated on both sides of the Lord as well as behind Him, were constantly offering prayers to Him.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥