श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  6.4.33 
योऽनुग्रहार्थं भजतां पादमूल-
मनामरूपो भगवाननन्त: ।
नामानि रूपाणि च जन्मकर्मभि-
र्भेजे स मह्यं परम: प्रसीदतु ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् जो सारे भौतिक नामों, रूपों तथा लीलाओं से परे हैं तथा जो सर्वव्यापी हैं, वे अपने भक्तों पर असीम कृपा रखते हैं जो उनके चरणकमलों की पूजा करते हैं। इस तरह वे विभिन्न लीलाओं के साथ दिव्य रूपों और नामों को प्रकट करते हैं। ऐसे भगवान्, जिनका रूप शाश्वत और ज्ञान और आनंद से भरा है, मुझ पर कृपालु हों।
 
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् जो सारे भौतिक नामों, रूपों तथा लीलाओं से परे हैं तथा जो सर्वव्यापी हैं, वे अपने भक्तों पर असीम कृपा रखते हैं जो उनके चरणकमलों की पूजा करते हैं। इस तरह वे विभिन्न लीलाओं के साथ दिव्य रूपों और नामों को प्रकट करते हैं। ऐसे भगवान्, जिनका रूप शाश्वत और ज्ञान और आनंद से भरा है, मुझ पर कृपालु हों।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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