तर्को ऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना
नासाव ऋषिर्यस्य मतं न भिन्नम्
सभी तर्क-वितर्क करने वालों को अन्य तर्क-वितर्क करने वालों से असहमत होना चाहिए; अन्यथा, सर्वोच्च कारण का पता लगाने से संबंधित इतने विरोधी दल क्यों होने चाहिए?
दर्शन का अर्थ है परम कारण को खोजना। जैसा कि वेदांत-सूत्र बहुत ही तर्कसंगत रूप से कहता है, अथातो ब्रह्म जिज्ञासा: मानव जीवन परम कारण को समझने के लिए है। भक्त स्वीकार करते हैं कि परम कारण कृष्ण है क्योंकि यह निष्कर्ष सभी वैदिक साहित्य और स्वयं कृष्ण द्वारा भी समर्थित है, जो कहते हैं, अहं सर्वस्य प्रभवः: "मैं सब कुछ का स्रोत हूं।" भक्तों को हर चीज के परम कारण को समझने में कोई समस्या नहीं होती है, लेकिन अभक्तों को कई विरोधी तत्वों का सामना करना पड़ता है क्योंकि हर कोई जो एक प्रमुख दार्शनिक बनना चाहता है, वह अपना रास्ता खुद बनाता है। भारत में दार्शनिकों के कई दल हैं, जैसे कि द्वैतवादी, अद्वैतवादी, वैशेषिक, मीमांसक, मायावादी और स्वाभाववादी, और उनमें से प्रत्येक एक दूसरे का विरोध करता है। इसी तरह, पश्चिमी देशों में भी कई दार्शनिक हैं जिनके सृजन, जीवन, पालन और विनाश के बारे में अलग-अलग विचार हैं। इस प्रकार यह निश्चित रूप से एक तथ्य है कि दुनिया भर में अनगिनत दार्शनिक हैं, उनमें से प्रत्येक एक दूसरे का खंडन करता है।
अब, कोई यह पूछ सकता है कि अगर दर्शन का अंतिम लक्ष्य एक है तो इतने सारे दार्शनिक क्यों हैं? निःसंदेह परम कारण एक है - सर्वोच्च ब्रह्म। जैसा कि अर्जुन ने भगवद-गीता (10.12) में कृष्ण से कहा था:
परं ब्रह्म परं धाम
पवित्रं परमं भवान
पुरुषं शाश्वतं दिव्यं
आदि-देवं अजं विभुम्
"आप सर्वोच्च ब्रह्म हैं, परम, सर्वोच्च निवास और पवित्र करने वाले, परम सत्य और शाश्वत दिव्य व्यक्ति हैं। आप आदिम भगवान हैं, पारलौकिक और मूल हैं, और आप अजन्मा और सर्वव्यापी सौंदर्य हैं।" अभक्त तर्क-वितर्क करने वाले, हालांकि, एक परम कारण (सर्व-कारण-कारणम) स्वीकार नहीं करते हैं। क्योंकि वे आत्मा और उसकी गतिविधियों के बारे में अनभिज्ञ और भ्रमित हैं, भले ही उनमें से कुछ को आत्मा के बारे में एक अस्पष्ट विचार है, कई विवाद उत्पन्न होते हैं, और दार्शनिक तर्क करने वाले कभी भी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकते हैं। ये सभी तर्ककर्ता भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व से ईर्ष्या करते हैं, और जैसा कि कृष्ण भगवद-गीता (16.19-20) में कहते हैं:
तान अहं द्विषतः क्रूरान्
संसाऱेषु नराधमान्
क्षिपाम्य अजस्रं अशुभान्
आसुरीषु एव योनिषु
आसुरीं योनिमापन्ना
मूढा जन्मनि जन्मनि
माम् अप्राप्यैव कौन्तेय
ततो यान्त्य अधमां गतिम्
"जो ईर्ष्यालु और शरारती हैं, जो मनुष्यों में सबसे नीच हैं, मुझे भौतिक अस्तित्व के सागर में, जीवन की विभिन्न राक्षसी प्रजातियों में डाल दिया जाता है। राक्षसी जीवन की प्रजातियों में बार-बार जन्म लेने पर, ऐसे व्यक्ति कभी भी मेरे पास नहीं आ सकते। धीरे-धीरे वे सबसे घृणित प्रकार के अस्तित्व में डूब जाते हैं।" सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान से उनकी ईर्ष्या के कारण, अभक्त जन्म के बाद जन्म राक्षसी परिवारों में जन्म लेते हैं। वे महान अपराधी हैं, और उनके अपराधों के कारण सर्वोच्च भगवान उन्हें हमेशा भ्रमित रखते हैं। कुर्वन्ति कैषां मुहुर् आत्म-मोहम्: भगवान, सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान, जानबूझकर उन्हें अंधेरे (आत्म-मोहम्) में रखते हैं।
व्यासदेव के पिता, महान अधिकारी पराशर, इस प्रकार सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान की व्याख्या करते हैं:
ज्ञान-शक्ति-बलैश्वर्य-
वीर्य-तेजांस्य अशेषतः
भगवच्छब्द-वाच्यानि
विना हेयैर् गुणादिभिः
राक्षसी विचारक सर्वोच्च भगवान के भौतिक दोषों से रहित दिव्य गुण, रूप, लीलाएँ, शक्ति, ज्ञान और ऐश्वर्य आदि को समझ नहीं सकते (विना हेयैर् गुणादिभिः)। ये विचारक भगवान के अस्तित्व से आ ईर्ष्या करते हैं। जगाद आहुर अनीश्वरमः उनका निष्कर्ष है कि सम्पूर्ण ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति का कोई नियंत्रक नहीं है, बल्कि यह स्वाभाविक रूप से ही काम कर रहा है। इस तरह, वे जन्म के बाद जन्म अंधकार में रहते हैं, और सभी कारणों के वास्तविक कारण को नहीं समझ सकते। यही कारण है कि दार्शनिक विचारों के बहुत से स्कूल हैं।
