येषां त्वंता-गतं पापं
जनानां पुण्य-कर्माणां
ते द्वंद्व-मोह-निर्मुक्ता
भजन्ते माम द्रढव्रताः
"जो लोग पिछले जन्मों और इस जन्म में धर्मी कर्मों का पालन करते हैं, जिनके पाप कर्म पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं और जो भ्रम के द्वैत से मुक्त होते हैं, वे मेरे प्रति निष्ठा से भक्ति करते हैं।"
भगवत-गीता (9.14) में प्रभु कहते हैं:
सतातं कीर्तयंतो माम
यतंताश्च द्रढव्रताः
नमस्यंतश्च माम भक्त्या
नित्य-युक्ता उपासते
"हमेशा मेरे गौरव का बखान करते हुए, निष्ठा से परिश्रम करते हुए, मेरे प्रति भक्ति करते हुए ये महान आत्माएँ सदा मेरी पूजा करती हैं।"
सभी भौतिक रुकावटों को पार करने के बाद आप परमेश्वर को समझ सकते हैं। इसलिए गीता (7.3) में प्रभु कृष्ण यह भी कहते हैं:
मनुष्याणां सहस्रेषु
कश्चित् यतति सिद्धये
यतातामपि सिद्धानां
कश्चित् माम वेति तत्तवतः
"हजारों मनुष्यों में से कोई सिद्धि के लिए प्रयत्न कर सकता है और सिद्धि पाने वालों में भी कोई-कोई मुझे सचमुच जानता है।"
परमेश्वर कृष्ण को समझने के लिए एक को घोर तपस्या और संयम का रास्ता अपनाना पड़ता है, लेकिन क्योंकि भक्ति का मार्ग परिपूर्ण है, इस प्रक्रिया का अनुसरण करके एक व्यक्ति बहुत आसानी से आध्यात्मिक मंच पर आ सकता है और प्रभु को समझ सकता है। इसकी पुष्टि भी भगवद-गीता (18.55) में की गई है, जिसमें कृष्ण कहते हैं:
भक्त्या माम भिजानाति
यावान् याश्चस्मि तत्तवता:
ततो माम तत्तवतो ज्ञात्वा
विशते तदंनंतरम
"भक्ति के द्वारा ही आप परमेश्वर को उनकी सच्ची प्रकृति के अनुसार समझ सकते हैं। और जब भक्ति के द्वारा आप परम प्रभु की पूरी जागरूकता पा लेते हैं, तो आप ईश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं।"
इस प्रकार, यद्यपि विषय दुर्विनज्ञेयम है, जिसे समझना बहुत कठिन है, फिर भी, यदि एक व्यक्ति निर्धारित विधि का अनुसरण करता है, तो यह आसान हो जाता है। श्रवणं कीर्तनं विष्णोः से शुरु होने वाली विशुद्ध भक्ति के माध्यम से परमेश्वर के संपर्क में आना संभव है। इस संबंध में, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर श्रीमद भागवतम (2.8.5) से एक पद उद्धृत करते हैं: प्रविष्ट: कर्ण-रंध्रेण स्वानाम भाव-सरोरूहम। श्रवण और कीर्तन की प्रक्रिया हृदय के केंद्र में प्रवेश करती है और इस तरह एक व्यक्ति एक शुद्ध भक्त बन जाता है। इस प्रक्रिया को जारी रखने से, एक व्यक्ति अनुभव प्रेम के स्तर तक पहुँच जाता है और फिर वह परमेश्वर के अनुभव नाम, रूप, गुणों और क्रीड़ाओं का आनंद उठाता है। दूसरे शब्दों में, एक शुद्ध भक्त, भक्ति के द्वारा उन सभी भौतिक रुकावटों के बावजूद परमेश्वर को देखने में सक्षम हो जाता है जो सभी परमेश्वर की ऊर्जाएँ हैं। धैर्यपूर्वक इन रुकावटों को पार करते हुए, एक भक्त सीधे परमेश्वर के संपर्क में आ जाता है। आखिरकार, इन छंदों में वर्णित भौतिक रुकावटें प्रभु की ऊर्जाएँ ही हैं। जब एक भक्त परमेश्वर को देखने के लिए उत्सुक होता है, तो वह भगवान से प्रार्थना करता है:
अयि नंद-तनुज किंकरं
पतितं माम विषमे भवांभौधौ
कृपया तव पदपंकज-
स्थित-धूली-सदृशं विचिंतय
"महाराजा नंद के पुत्र [कृष्ण], मैं आपका शाश्वत दास हूँ, फिर भी किसी न किसी तरह मैं जन्म और मृत्यु के समुद्र में गिर गया हूँ। कृपया मुझे मृत्यु के इस समुद्र से उबारें और अपने चरणों की धूलि में एक परमाणु के रूप में रखें।" भक्त से प्रसन्न होकर, भगवान उसके सभी भौतिक रुकावटों को आध्यात्मिक सेवा में बदल देते हैं। इस संबंध में श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर विष्णु पुराण से एक पद उद्धृत करते हैं:
ह्लादिनी संधिनि संवित
त्वय्येक सर्व-संस्थितौ
ह्लाद-ताप-कारी मिश्रा
त्वयि नो गुण-वर्जिते
भौतिक जगत में, भगवान के श्रेष्ठ व्यक्तित्व की आध्यात्मिक ऊर्जा 'तपा-कारी' के रूप में प्रकट होती है, जिसका अर्थ "दुःख पैदा करना" है। हर कोई सुख की कामना करता है, लेकिन भले ही सुख मूल रूप से भगवान के श्रेष्ठ व्यक्तित्व की आनंद शक्ति से आता है, भौतिक जगत में, भौतिक गतिविधियों के कारण, भगवान की आनंद शक्ति दुखों (हल्दा-ताप-कारी) का एक स्रोत बन जाती है। भौतिक जगत में झूठा सुख संताप का स्रोत है, लेकिन जब सुख के लिए किसी के प्रयास भगवान के श्रेष्ठ व्यक्तित्व की संतुष्टि की ओर पुनर्निर्देशित किए जाते हैं, तो दुख का यह तापा-कारी तत्व नष्ट हो जाता है। इस संबंध में दिया गया एक उदाहरण यह है कि लकड़ी से आग निकालना निश्चित रूप से कठिन है, लेकिन जब आग निकलती है, तो वह लकड़ी को राख में जला देती है। दूसरे शब्दों में, भगवान के श्रेष्ठ व्यक्तित्व का अनुभव करना भक्ति सेवा से रहित लोगों के लिए अत्यंत कठिन है, लेकिन एक भक्त के लिए सब कुछ आसान हो जाता है, और इस तरह वह बहुत आसानी से भगवान से मिल सकता है।
यहाँ प्रार्थनाएँ कहती हैं कि भगवान का रूप भौतिक रूप के अधिकार क्षेत्र से परे है और इसलिए अकल्पनीय है। फिर भी, एक भक्त प्रार्थना करता है, "मेरे प्रिय प्रभु, मुझसे प्रसन्न हो ताकि मैं आपके पारलौकिक रूप और शक्ति को बहुत आसानी से देख सकूं।" अभक्त निष्ठा से चर्चाओं के द्वारा सर्वोच्च ब्राह्मण को समझने का प्रयास करते हैं। निषेध-निर्वाण-सुखानुभूतिः: एक भक्त, हालाँकि, केवल भगवान के पवित्र नाम का जाप करके, ऐसी श्रमसाध्य अटकलों से बचता है और भगवान के अस्तित्व को बहुत आसानी से समझ लेता है।
