श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  6.4.24 
न यस्य सख्यं पुरुषोऽवैति सख्यु:
सखा वसन् संवसत: पुरेऽस्मिन् ।
गुणो यथा गुणिनो व्यक्तद‍ृष्टे-
स्तस्मै महेशाय नमस्करोमि ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
जैसे इंद्रिय-विषय (रूप, स्वाद, स्पर्श, गंध और ध्वनि) यह नहीं समझ सकते कि इंद्रियां उनका अनुभव कैसे करती हैं, उसी प्रकार बद्ध आत्मा, यद्यपि अपने शरीर में परमात्मा के साथ निवास करती है, यह नहीं समझ सकती कि भौतिक सृष्टि के स्वामी परम आध्यात्मिक पुरुष उसकी इंद्रियों को कैसे निर्देशित करते हैं। मैं उस परम पुरुष को विनम्र प्रणाम करता हूं जो परम नियंत्रक है।
 
Just as the sense-objects (sight, taste, touch, smell and sound) cannot understand how the senses perceive them, so the conditioned soul, though living in his body with the Supreme Soul, cannot understand how the Supreme Spiritual Person, the Lord of the material creation, directs his senses. I offer my respectful obeisances unto the Supreme Person, who is the supreme controller.
तात्पर्य
व्यक्तिगत आत्मा और परम आत्मा शरीर में एक साथ रहते हैं। उपनिषदों में इसकी पुष्टि इस दृष्टांत से की गई है कि दो मित्र पक्षी एक पेड़ में रहते हैं - एक पक्षी पेड़ का फल खा रहा है और दूसरा बस साक्षी होकर निर्देश दे रहा है। यद्यपि व्यक्तिगत जीवित प्राणी, जिसकी तुलना खाने वाले पक्षी से की जाती है, अपने मित्र परम आत्मा के साथ बैठा है, लेकिन व्यक्तिगत जीवित प्राणी उसे नहीं देख सकता है। वास्तव में परमात्मा इंद्रिय विषयों के उपभोग में उसकी इंद्रियों के काम को निर्देशित कर रहा है, लेकिन जैसे ये इंद्रिय विषय इंद्रियों को नहीं देख सकते हैं, वैसे ही सशर्त आत्मा निर्देशक आत्मा को नहीं देख सकता है। सशर्त आत्मा की इच्छाएँ होती हैं, और परम आत्मा उन्हें पूरा करता है, लेकिन सशर्त आत्मा परम आत्मा को देखने में असमर्थ होता है। इस प्रकार प्रजापति दक्ष परम आत्मा, परमात्मा को अपनी आज्ञाकारिता प्रदान करते हैं, भले ही वे उसे देखने में असमर्थ हों। एक और दिया गया उदाहरण यह है कि यद्यपि सामान्य नागरिक सरकार के निर्देशन में काम करते हैं, लेकिन वे यह नहीं समझ सकते हैं कि उन्हें कैसे शासित किया जा रहा है या सरकार क्या है। इस संबंध में, माध्वाचार्य स्कंद पुराण से निम्नलिखित श्लोक उद्धृत करते हैं:

यथा राज्ञः प्रियत्वं तु

भृत्या वेणेदात्मनः

तथा जीवो न यत्-सख्यं

वेत्ति तस्मै नमोऽस्तु ते

"जैसे बड़े प्रतिष्ठानों के विभिन्न विभागों में विभिन्न सेवक उस सर्वोच्च प्रबंध निदेशक को नहीं देख सकते जिसके अधीन वे काम कर रहे हैं, वैसे ही सशर्त आत्माएँ अपने शरीर के भीतर बैठे सर्वोच्च मित्र को नहीं देख सकतीं। इसलिए आइए हम सर्वोच्च को अपना सम्मानजनक आज्ञाकारिता अर्पित करें, जो हमारी भौतिक आँखों के लिए अदृश्य है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)