श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  6.4.24 
न यस्य सख्यं पुरुषोऽवैति सख्यु:
सखा वसन् संवसत: पुरेऽस्मिन् ।
गुणो यथा गुणिनो व्यक्तद‍ृष्टे-
स्तस्मै महेशाय नमस्करोमि ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
जैसे इंद्रिय-विषय (रूप, स्वाद, स्पर्श, गंध और ध्वनि) यह नहीं समझ सकते कि इंद्रियां उनका अनुभव कैसे करती हैं, उसी प्रकार बद्ध आत्मा, यद्यपि अपने शरीर में परमात्मा के साथ निवास करती है, यह नहीं समझ सकती कि भौतिक सृष्टि के स्वामी परम आध्यात्मिक पुरुष उसकी इंद्रियों को कैसे निर्देशित करते हैं। मैं उस परम पुरुष को विनम्र प्रणाम करता हूं जो परम नियंत्रक है।
 
जैसे इंद्रिय-विषय (रूप, स्वाद, स्पर्श, गंध और ध्वनि) यह नहीं समझ सकते कि इंद्रियां उनका अनुभव कैसे करती हैं, उसी प्रकार बद्ध आत्मा, यद्यपि अपने शरीर में परमात्मा के साथ निवास करती है, यह नहीं समझ सकती कि भौतिक सृष्टि के स्वामी परम आध्यात्मिक पुरुष उसकी इंद्रियों को कैसे निर्देशित करते हैं। मैं उस परम पुरुष को विनम्र प्रणाम करता हूं जो परम नियंत्रक है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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