यथा राज्ञः प्रियत्वं तु
भृत्या वेणेदात्मनः
तथा जीवो न यत्-सख्यं
वेत्ति तस्मै नमोऽस्तु ते
"जैसे बड़े प्रतिष्ठानों के विभिन्न विभागों में विभिन्न सेवक उस सर्वोच्च प्रबंध निदेशक को नहीं देख सकते जिसके अधीन वे काम कर रहे हैं, वैसे ही सशर्त आत्माएँ अपने शरीर के भीतर बैठे सर्वोच्च मित्र को नहीं देख सकतीं। इसलिए आइए हम सर्वोच्च को अपना सम्मानजनक आज्ञाकारिता अर्पित करें, जो हमारी भौतिक आँखों के लिए अदृश्य है।"
