श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  6.4.22 
अस्तौषीद्धंसगुह्येन भगवन्तमधोक्षजम् ।
तुभ्यं तदभिधास्यामि कस्यातुष्यद्यथा हरि: ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजन्! अब मैं आपसे हंसगुह्य नामक स्तुतियों की पूरी व्याख्या करूँगा। इन स्तुतियों को दक्ष ने भगवान् को समर्पित किया था और इन प्रार्थनाओं की वजह से भगवान् उन पर प्रसन्न भी हुए थे।
 
O King, I will now explain to you in detail the praises called Hamsaguhya which Daksha offered to the Lord, and I will tell how the Lord was pleased with him by those praises.
तात्पर्य
यह समझना होगा कि हंसगुह्य मन्त्र दक्ष द्वारा रचित न होकर वेद साहित्य मे विद्यमान हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)