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श्लोक 6.4.22  |
अस्तौषीद्धंसगुह्येन भगवन्तमधोक्षजम् ।
तुभ्यं तदभिधास्यामि कस्यातुष्यद्यथा हरि: ॥ २२ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे राजन्! अब मैं आपसे हंसगुह्य नामक स्तुतियों की पूरी व्याख्या करूँगा। इन स्तुतियों को दक्ष ने भगवान् को समर्पित किया था और इन प्रार्थनाओं की वजह से भगवान् उन पर प्रसन्न भी हुए थे। |
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| हे राजन्! अब मैं आपसे हंसगुह्य नामक स्तुतियों की पूरी व्याख्या करूँगा। इन स्तुतियों को दक्ष ने भगवान् को समर्पित किया था और इन प्रार्थनाओं की वजह से भगवान् उन पर प्रसन्न भी हुए थे। |
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