श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  6.4.17 
तेभ्यस्तस्यां समभवद् दक्ष: प्राचेतस: किल ।
यस्य प्रजाविसर्गेण लोका आपूरितास्त्रय: ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
उस कन्या के गर्भ से सभी प्रचेताओं ने दक्ष नामक एक पुत्र पैदा किया, जिसने तीनों लोकों को जीवों से भर दिया।
 
From the womb of that girl the Prachetas produced a son named Daksha who filled the three worlds with living beings.
तात्पर्य
दक्ष का जन्म सर्वप्रथम स्वायम्भुव मनु के शासन काल में हुआ था, परन्तु भगवान् शिव का अपमान करने के कारण उन्हें दण्डस्वरूप बकरे का सिर उनके अपने सिर के बदले में देना पड़ा। इस प्रकार अपमानित होकर उनका वह शरीर छोड़ना पड़ा, और छठे मन्वन्तर, जिसे चाक्षुष मन्वन्तर कहा जाता है, में उनका जन्म मारीशा की कोख से दक्ष के रूप में हुआ। इस संदर्भ में श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर इस श्लोक का उद्धरण देते हैं:

चाक्षुसे त्वन्तरे प्राप्ते

प्राक्-सर्गे काल-विद्रुते

यः ससर्ज प्रजा इष्टाः

स दक्षो दैव-कोदितः

"उनका पिछला शरीर नष्ट हो चुका था, परन्तु वे स्वयं, जो वही दक्ष थे, सर्वोच्च इच्छा से प्रेरित होकर, चाक्षुष मन्वन्तर में सभी वांछित जीवों की रचना की।" (भाग. 4.30.49) इस प्रकार दक्ष ने अपना पिछला वैभव पुनः प्राप्त किया और तीनों लोकों को भरने के लिए हजारों और लाखों संतानों को पुनः जन्म दिया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)