श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  6.4.14 
य: समुत्पतितं देह आकाशान्मन्युमुल्बणम् ।
आत्मजिज्ञासया यच्छेत्स गुणानतिवर्तते ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति आत्मसाक्षात्कार के लिए जिज्ञासा रखता है और इस तरह अपने शक्तिशाली क्रोध को वश में करता है—जो शरीर में अचानक जाग्रत हो जाता है, मानो आकाश से गिरा हो—वह भौतिक प्रकृति के गुणों के प्रभावों से परे हो जाता है।
 
जो व्यक्ति आत्मसाक्षात्कार के लिए जिज्ञासा रखता है और इस तरह अपने शक्तिशाली क्रोध को वश में करता है—जो शरीर में अचानक जाग्रत हो जाता है, मानो आकाश से गिरा हो—वह भौतिक प्रकृति के गुणों के प्रभावों से परे हो जाता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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