श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  6.4.12 
तोकानां पितरौ बन्धू द‍ृश: पक्ष्म स्त्रिया: पति: ।
पति: प्रजानां भिक्षूणां गृह्यज्ञानां बुध: सुहृत् ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
पिता और माता जिस प्रकार अपने बच्चों के मित्र और पालनकर्ता होते हैं, जिस तरह पलक आंख की रक्षा करती है, पति जिस तरह पत्नी का भरण-पोषण करता है और उसकी रक्षा करता है, जिस तरह से गृहस्थ भिखारियों को भोजन देता है और उनकी रक्षा करता है, और जिस तरह विद्वान अज्ञानी के मित्र होते हैं, उसी तरह राजा अपनी प्रजा का रक्षक और जीवनदाता होता है। वृक्ष भी राजा की प्रजा होती हैं, इसलिए उन्हें भी सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए।
 
Just as a father and mother are friends and caretakers of their children, just as an eyelid protects an eye, just as a husband is the breadwinner and protector of his wife, just as a householder is the provider and protector of beggars and just as a learned man is a friend of an ignorant person, similarly a king is the protector and life-giver of his subjects. Trees are also the subjects of a king, hence they should also be given protection.
तात्पर्य
भगवान की परम इच्छा से, असहाय जीवों के लिए विभिन्न रक्षक और पालक हैं। पेड़ों को भी प्रजा माना जाता है, राजा के अधीन, और इसलिए सम्राट का कर्तव्य है पेड़ों की रक्षा भी करना है, दूसरों की बात तो छोड़ ही दें। राजा अपने राज्य में जीवों की रक्षा करने के लिए कर्तव्यबद्ध है। इस प्रकार यद्यपि माता-पिता अपने बच्चों की सुरक्षा और पालन-पोषण के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार होते हैं, राजा का कर्तव्य यह देखना है कि सभी माता-पिता अपना कर्तव्य ठीक से निभाएँ। इसी तरह, राजा इस श्लोक में उल्लिखित अन्य रक्षकों की देखरेख के लिए भी जिम्मेदार है। यह भी ध्यान दिया जा सकता है कि जिन भिखारियों का भरण-पोषण घरवालों द्वारा किया जाना चाहिए, वे पेशेवर भिखारी नहीं हैं, बल्कि संन्यासी और ब्राह्मण हैं, जिन्हें घरवालों को भोजन और वस्त्र प्रदान करना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)