श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  6.4.11 
आतिष्ठत सतां मार्गं कोपं यच्छत दीपितम् ।
पित्रा पितामहेनापि जुष्टं व: प्रपितामहै: ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
तुम्हारे पिता, परदादा और पुराने दादाओं ने जिस अच्छे रास्ते का पालन किया वह प्रजा पालन का था जिसमें मनुष्य, पशु और वृक्ष भी शामिल हैं। तुम्हें भी उसी रास्ते पर चलना चाहिए। बेवजह में गुस्सा होना तुम्हारे कर्तव्य के खिलाफ है। इसीलिए मेरी प्रार्थना है कि तुम अपने क्रोध पर नियंत्रण रखो।
 
तुम्हारे पिता, परदादा और पुराने दादाओं ने जिस अच्छे रास्ते का पालन किया वह प्रजा पालन का था जिसमें मनुष्य, पशु और वृक्ष भी शामिल हैं। तुम्हें भी उसी रास्ते पर चलना चाहिए। बेवजह में गुस्सा होना तुम्हारे कर्तव्य के खिलाफ है। इसीलिए मेरी प्रार्थना है कि तुम अपने क्रोध पर नियंत्रण रखो।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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