जो भक्त भगवान कृष्ण के चरणकमलों के मधु का हमेशा पान करते हैं, वे भौतिक कर्मों की तनिक भी चिंता नहीं करते। ये भौतिक कर्म प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार किए जाते हैं और दुखदायी होते हैं। दरअसल, भौतिक कर्मों में लौटने के लिए भक्त कभी भी कृष्ण के चरणकमलों को नहीं त्यागते। परंतु अन्य लोग जो भगवान के चरणकमलों की सेवा की उपेक्षा करते हैं और कामवासना से भरे होते हैं, वैदिक कर्मकांडों में लगे रहते हैं, कभी-कभी प्रायश्चित्त के कर्म करते हैं। फिर भी, अपूर्ण रूप से शुद्ध होने के कारण वे बार-बार पापकर्मों में लौट आते हैं।
The devotees who are always licking the honey from the feet of Lord Krsna do not care at all for the material activities which are performed under the three modes of nature and which are only painful. Actually, devotees never leave the feet of Krsna to return to material activities. But others, who neglect the service of the feet of the Lord and engage in Vedic rituals because of being bewildered by lustful desires, sometimes perform acts of propitiation. Yet, being imperfectly purified, they again and again return to sinful activities.
तात्पर्य
भक्त का कर्तव्य हरि-कृष्ण मंत्र का जाप करना है। कभी कोई अपराध करते हुए मंत्र जपता है तो कभी अपराध किए बिना, पर यदि कोई ईमानदारी से इस विधि को अपनाता है तो वह पूर्णता प्राप्त कर लेता है, जिसे प्रायश्चित्त का वैदिक कर्मकांड करके प्राप्त नहीं किया जा सकता। वे लोग जो वैदिक कर्मकांडों से जुड़े हैं, पर भक्ति में विश्वास नहीं करते, जो प्रायश्चित्त देने की सलाह तो देते हैं पर प्रभु के पवित्र नाम के जप की कद्र नहीं करते हैं, वे उच्चतम पूर्णता प्राप्त करने में असफल हो जाते हैं। इसीलिए, भक्त भौतिक सुखों से पूर्णतः वैराग्यवान होते हुए वैदिक कर्मकांडों के लिए कृष्ण चेतना का त्याग कभी नहीं करते। वे लोग जो कामुक इच्छाओं के कारण वैदिक कर्मकांडों से जुड़े होते हैं, वे बार-बार भौतिक अस्तित्व के कष्ट उठाते हैं। महाराज परीक्षित ने उनके कृत्यों की तुलना कुनजर-शौच से की है, यानी हाथी के नहाने से।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥