श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 3: यमराज द्वारा अपने दूतों को आदेश  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  6.3.31 
तस्मात् सङ्कीर्तनं विष्णोर्जगन्मङ्गलमंहसाम् ।
महतामपि कौरव्य विद्ध्यैकान्तिकनिष्कृतम् ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने कहा: हे राजन्! भगवान के पवित्र नाम का जाप बड़े से बड़े पापों के परिणामों को भी मिटा सकता है। इसलिए संकीर्तन आंदोलन का कीर्तन पूरे ब्रह्मांड में सबसे शुभ कार्य है। कृपया इसे समझने का प्रयास करें ताकि अन्य लोग इसे गंभीरता से ले सकें।
 
Sukadeva Goswami said: O King! The chanting of the Lord's name is capable of eradicating the effects of even the greatest sins. Therefore, the chanting of the Sankirtana movement is the most auspicious act in the entire universe. Please try to understand this so that others may take it seriously.
तात्पर्य
हमें ध्यान रखना चाहिए कि हालाँकि अजामिल ने नारायण के नाम का अपूर्ण उच्चारण किया, किंतु उन्हें सभी पाप कर्मों के प्रभाव से मुक्ति मिल गई। पवित्र नाम का उच्चारण इतना शुभ है कि यह सभी को पाप कर्मों के प्रभावों से मुक्त कर सकता है। हमें यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि हम पाप करते रहें और प्रतिक्रियाओं को निष्प्रभावी बनाने के लिए हरि कृष्ण का जाप करें। इसके बजाय, हमें सभी पापों से मुक्त रहने और हरि कृष्ण मंत्र का जाप करके पापों का प्रतिकार करने के बारे में कभी नहीं सोचना चाहिए, क्योंकि यह एक और अपराध है। यदि संयोग से कोई भक्त गलती से कोई पाप कर्म कर लेता है, तो प्रभु उसे क्षमा कर देंगे, लेकिन जानबूझकर पाप कर्म नहीं करने चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)